मेरा देश मेरी बात !

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bhagwandassmendiratta


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जाट ऐसे तो न थे !

Posted On: 2 Mar, 2016  
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फिर बहेगा लहु इक बार, फिर महाभारत होने को है!

Posted On: 14 Feb, 2016  
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*****बुरे फँसे सरकार बना कर*****

Posted On: 6 Feb, 2016  
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नक्सलवाद बनाम सशस्त्रबल

Posted On: 28 Jan, 2016  
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मैं बोल रहा हूँ, नरेंद्र दामोदर मोदी

Posted On: 9 Jan, 2016  
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क्या आवश्यक था, जले पे नमक लगाना?

Posted On: 9 May, 2015  
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ओहदेदार (पूर्वार्ध भाग)

Posted On: 8 Apr, 2015  
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Hindi Sahitya Others में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Bhola nath Pal Bhola nath Pal

भगवान दास जी जय श्रीराम ! आपका लेख आज के राजनीतिज्ञों के लिए गीता है, रामायण है, बाईबिल है कुरान है ! अरे ये धार्मिक ग्रन्थ अपनी देश की मिट्टी से प्यार करना सिखाती हैं न की नफ़रत करना ! क्या सियासत हथियाने के लिए किसी गद्दार की हाँ में हाँ मिलाना ही देश भक्ति कहलाती है ? अरे बिघटनकारी तत्वों को हवा देने वालो नेताओ संभल जाओ मत भूलो पृथ्वीराज चौहान को जो अपने ही ससुर की गद्दारी का शिकार हुआ ! और उस जयचंद को इनाम में क्या मिला सरे आम मौत, गौरी ने यह कहते हुए की जो इंसान अपने दामाद की पीठ पर छूरा भोंक सकता है वह मेरा मददगार कैसे होसकता है, सरे आम उसकी गर्दन उदादी थी ! वास्तविकता से लबालब भरा आपका लेख राह भटके देश वासियों के लिए गाइड लाईन है ! साधुवाद !

के द्वारा: harirawat harirawat

बहुत अच्छा आदरणीय भगवन दास जी, आपने तो ऐसा लगता है, उन दोनों के मन में बैठकर यह एकांकी लिखा है.जरूर उनलोगों के मन में उधेड़ बन चल रहा होगा. पर मेरा मानना है परिवर्तन के लिए संघर्ष तो करना पड़ता है. यही वो बंदा है जो किसी से नहीं डरता. कठिनाइयां आएंगी लोग कांटे बिछायेंगे. काँटों का ताज ही पहना है इन लोगों ने. जनता ने ऐसा बहुमत किसी को नहीं दिया होगा आज तक ...फिर भी अगर दिल्ली की जनता इनसे अगर खुश है तो आगे भी राह आसान हो जाएगी. सिस्टम से लड़ना और उसे बदलना उतना आसान नहीं है. मोदी जी ही कितना कुछ कर प् रहे हैं. एक परिवार उन्हें रोक रहा है कुछ करने से. अब तो वाड्रा को भी क्लीन चिट मिल गयी. सफलता के लिए मोदी जी के पास काया है कहने को. स्वच्छताभियां की धज्जी खुद उनकी ही दिल्ली की MCD उड़ा रही है. ... मैं भी इसी पर आधारित लिखनेवाला हूँ पर आपकी नाटकीय व्यंग्यात्मक शैली रोचक है. बहुत बहुत अभिनंदन आपका!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

भगवनदासजी, आपके विचार तथ्यपरक भी हैं और तर्कसंगत भी । कुछ वर्ष पूर्व आई हिन्दी फ़िल्म 'चक्रव्यूह' में आपके विचारों का ही रूप कथानक में पिरोया गया था । अन्याय जब सभी सीमाएं पार कर जाए और न्याय की कहीं राईरत्ती भी आशा न रहे तो ऐसे में पीड़ित क्या करे ? कुछ दशक पूर्व बहुत-से ऐसे पीड़ित बंदूक उठाकर डाकू भी बन जाते थे लेकिन वे अपने आपको डाकू नहीं बाग़ी कहते थे - सामाजिक अन्याय के विरुद्ध बग़ावत करने वाले बाग़ी । नक्सलियों का दमन कोई भी सरकार अपनी अंधी ताक़त से नहीं कर सकती । समस्या के मूल में उनके साथ अनवरत होने वाले अन्याय ही हैं और कुछ नहीं । उन्हें न्याय दीजिए और मुख्यधारा में फिर से लौटने का एक अवसर भी दीजिए । जब ऐसा अवसर डाकुओं को दिया जा सकता था तो नक्सलियों को क्यों नहीं ? वे भी देश के नागरिक ही हैं, शत्रु नहीं ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

माननीय अच्युत केश्वम जी सर्वप्रथम तो मैं आपको आपके अति सुंदर नाम के लिए साधुवाद कहना चाहूँगा| प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद|ब्लाग पर आप की उपस्थिति प्रेरणा दायक है| मैं कभी भी ऐसा नहीं मानता कि हमारा पूरा समाज भ्रष्ट अथवा स्वार्थी और लालची है| समाज से मानव मूल्यों को प्राथमिकता देने वालों की संख्या तेज़ी से घट रही है, आप भी इससे इतफाक अवश्य रखते होंगे| मैने अपने लेख में भी शायद कुछ महत्वाकांक्षी लोगों की बात ही की है| मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जो एक आवाज़ पर [और आवाज़ न देने पर भी] देश और समाज पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तयार हैं| अच्छे लोगों की कमि नहीं है परंतु स्वार्थी लोग निरूत्साहित कर देते हैं उन्हें| जहाँ तक कश्मीरी पंडितों का प्रश्न है उनके दोषी प्रत्यक्ष रूप से उन के बीच के लोग हैं प्रशासन सीधे सीधे ज़िम्मेवार नहीं है| दूसरे, सभी हथियार उठा लेते हों ऐसा नक्सलियों में भी नहीं होता होगा| कश्मीरी पंडितों के अपराधियों को प्रकृति ने सज़ा दी, इसका ज़िक्र मैने अपने लेख "प्राकृतिक आपदाएँ और हम" में किया है| धन्यवाद|

के द्वारा: bhagwandassmendiratta bhagwandassmendiratta

भगवान दस् जी, आपने बिलकुल सही फरमाया, कछुवे को अपना सफर तय करने में पूरे १३ साल लगे, लगे नहीं जान बूझ कर ऊंची नाक पैसेवालों ने उसे भी खरीद लिया था, उसकी चाल खरीद ली थी, गनीमत थी उसे ही किडनेप नहीं किया, नहीं तो हमें यह सब कुछ सुनने लिखने का अवसर कहाँ मिलता ? एक जज महोदय जिनके दिल में गंगा यमुना की धार बहती रहती है, जो हजारों के बीच में अकेले थे फिर भी उन्होंने सच्चाई का साथ दिया, वीना किसी दर के और ५ साल की सश्रम सजा दे डाली, दर्शकों द्वारा बनाया हुआ अभिनेता, जिन बेचारों ने इस निर्दयी के कार के नीचे आकर, जान गंवाई, उनके परिवार के चेहरों पर हल्की सी खुशी की लहर उभरी थी ! भारतीय न्याय व्यवस्था पर सार्थक उम्मीद की किरण चमकी थी लेकिन अगले ही क्षण डेढ़ घंटे भी नहीं लगे १३ साल के रिकॉर्ड्स औंधे मुंह गिर गए, मुंह चिढ़ा रहे हैं .......ग़रीबों की निर्बलता व् असमर्था पर , उनके बहते आंसूओं पर ! मन की बात कहने के लिए बधाई, हरेन्द्र जागते रहो !

के द्वारा: harirawat harirawat

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

प्रकृति की अवहेलना कर के मनुष्य अपने ही विनाश की इबारत लिख रहा है| प्रकृति जड़ है क्योंकि उसके पास बुद्धि नहीं है वह केवल विधान का ही अनुसरण करती है| मनुष्य के पास बुद्धि है परंतु विधान का पालन नहीं करता, हम कर्म से ही नहीं मनसा वाचा भी अपराध करते हैं| प्रकृति ईश्वर के आधीन है वह ईश्वर के आदेश की अवहेलना कभी भी नहीं कर सकती और अपने कर्तव्य से भी कभी नहीं चूकती| आपके लेख की सार हैं ये पंक्तियाँ ! बहुत सुन्दर,सार्थक और शिक्षाप्रद रचना ! इस विचारणीय और यथार्थ दृष्टिकोण वाली आध्यात्मिकता से परिपूर्ण लेख की रचना के लिए आपका बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! अपने आत्मिक प्रेम और शुभकामनाओं सहित-सद्गुरुजी !

के द्वारा:

आदरणीय भगवानदास जी, 'जागरण जंक्शन' पर यूजर्स को मिली स्वतंत्रता 'सब की भौजाई' के प्रति सद्भाव-जैसी है | पर आप को पता ही है कि हमारे देश में सारे-के-सारे 'देवर' सद्भावी नहीं होते | ये लफंगे देवरों का भी देश है | सीधे न माने तो तेज़ाब के बोतलों वाले देवरों की करामात हमारे यहाँ लोवर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक और राष्ट्रपति भवन तक नादानी के नजरिये से देखी जाती है | सब को सुधरने का मौक़ा मिलना चाहिए | आखिर हम महान लोकतांत्रिक देश जो हैं | हमें-आप को अटपटा लग सकता है, किन्तु लोकतंत्र की ये उदारता मीडिया में भी है और 'जागरण जंक्शन' इसका ज्वलंत उदाहरण है | होली साल भर में एक बार आती है, लेकिन 'जागरण जंक्शन' पर इस तरह का 'बुरा न मानो होली है' साल भरा चलता रहता है तथा ऐसा करने वालों को नादाँ देवर माना जाता है | हाँ, आप को बड़ा बुरा लगा, क्योकि आप बड़े अदब से 'भौजाई' को नमस्ते करके आगे बढ़ जाने वाले देवर जो ठहरे और आप ने इस तथ्य को बड़े रोचक ढंग से उठाया भी | ... इसके लिए आप को सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ |

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय भगवानदास जी, 'जागरण जंक्शन' पर यूजर्स को मिली स्वतंत्रता 'सब की भौजाई' के प्रति सद्भाव-जैसी है | पर आप को पता ही है कि हमारे देश में सारे-के-सारे 'देवर' सद्भावी नहीं होते | ये लफंगे देवरों का भी देश है | सीधे न माने तो तेज़ाब के बोतलों वाले देवरों की करामात हमारे यहाँ लोवर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक और राष्ट्रपति भवन तक नादानी के नजरिये से देखी जाती है | सब को सुधरने का मौक़ा मिलना चाहिए | आखिर हम महान लोकतांत्रिक देश जो हैं | हमें-आप को अटपटा लग सकता है, किन्तु लोकतंत्र की ये उदारता मीडिया में भी है और 'जागरण जंक्शन' इसका ज्वलंत उदाहरण है | होली साल भर में एक बार आती है, लेकिन 'जागरण जंक्शन' पर इस तरह का 'बुरा न मानो होली है' साल भरा चलता रहता है तथा ऐसा करने वालों को नादाँ देवर माना जाता है |... हाँ, आप को बड़ा बुरा लगा, क्योकि आप बड़े अदब से 'भौजाई' को नमस्ते करके आगे बढ़ जाने वाले देवर जो ठहरे और आप ने इस तथ्य को बड़े रोचक ढंग से उठाया भी | इसके लिए आप को सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ |

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय भगवानदास जी, 'जागरण जंक्शन' पर यूजर्स को मिली स्वतंत्रता 'सब की भौजाई' के प्रति सद्भाव-जैसी है | पर आप को पता ही है कि हमारे देश में सारे-के-सारे 'देवर' सद्भावी नहीं होते | ये लफंगे देवरों का भी देश है | सीधे न माने तो तेज़ाब के बोतलों वाले देवरों की करामात हमारे यहाँ लोवर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक और राष्ट्रपति भवन तक नादानी के नजरिये से देखी जाती है | सब को सुधरने का मौक़ा मिलना चाहिए | आखिर हम महान लोकतांत्रिक देश जो हैं | हमें-आप को अटपटा लग सकता है, किन्तु लोकतंत्र की ये उदारता मीडिया में भी है और 'जागरण जंक्शन' इसका ज्वलंत उदाहरण है | होली साल भर में एक बार आती है, लेकिन 'जागरण जंक्शन' पर इस तरह का 'बुरा न मानो होली है' साल भरा चलता रहता है तथा ऐसा करने वालों को नादाँ देवर माना जाता है |... हाँ, आप को बड़ा बुरा लगा, क्योकि आप बड़े अदब से 'भौजाई' को नमस्ते करके आगे बढ़ जाने वाले देवर जो ठहरे और आप ने इस तथ्य को बड़े रोचक ढंग से उठाया भी | इसके लिए आप को हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ |

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

"पाकिस्तान को लगता है कि अपनी नापाक हरकतों से एक दिन भारत पर फ़तह पा लेगा? न जाने किस खुश फहमी में जी रहा है पाकिस्तान !" आदरणीय भगवान दास मेहन्दीरत्ता जी ! आपने बिल्कुल सही कहा है ! दरअसल कट्टरपंथी ईस्लामिक मुल्क होने के कारण भारत के प्रति पाकिस्तान की सोच हमेशा से ही नफरत भरी रही है ! उनके लिए हिंदुस्तान का अर्थ है-काफिरों का देश ! इसीलिए वो सब सपना देखते हैं कि एक दिन काश्मीर ही नहीं बल्कि पूरे भारत पर फ़तह पा लेंगे ! आपने लेख में सही कहा है कि "एक दिन रक्षक ही भक्षक बन अमरीका उसीको निगल जाएगा !"अमेरिका और मुस्लिम आतंकवादी दोनों ही पाकिस्तान की बर्बादी के लिए काफी हैं ! अमेरिका ने इसका एक नजारा भी पेश किया जब वो पाकिस्तान के भीतर घुसकर पाकिस्तान के बॉस लादेन को मार कर उठा ले गया और पाकिस्तान चुपचाप तमाशा देखता रह गया ! मुस्लिम आतंकवादी खुद पाकिस्तान के लिए एक बहुत बड़ा खतरा और बारहमासी सिरदर्द बन चुके हैं ! भारत पाकिस्तान से और काश्मीरी अलगाववादियों से ये बात साफ साफ कहना चाहिए कि काश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है और उसके भारत के विलय के बारे में कोई बात नहीं की जाएगी ! धरा ३७० समाप्त कर काश्मीर को भारत का एक सामान्य राज्य घोषित कर देना चाहिए ! इस सार्थक और विचारणीय लेख के लिए आपको बहुत बहुत बधाई !!

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चक्की पीसिंग एन पीसिंग,एन पीसिंग| और एक दिन वही माटी की माटी! क्यों है ऐसा? ये भी बताया गया है कि कोई भी प्राणी मुक्त नहीं, अपने कर्मों की बेड़ियों से बँधा है और परिणाम स्वरूप दुख व सुख भोगता है| जब कोई कहता है कि अमुक फ़ैसला उसका अपना है वो भी उसका अपना फ़ैसला नहीं होता, हर एक निर्णय बीते हुए कल से बँधा होता है और आने वाला कल उन्हीं निर्णयों पर निर्भर होता है| बंधन व दुखों से मुक्त होने के उपाय भी विस्तार पूर्वक सुझाए गये हैं, गीता में| ईश्वर ने बताया है कि विशेष कर्म और विशेष पद्धति से उन कर्मों का पालन करना ही बंधन मुक्त कर सकता है| या फिर प्रसन्नता पूर्वक जीवन व्यतीत किया जा सकता है| भगवान दास जी बहुत ही उत्तम ब्लॉग है आपको बहुत बहुत धन्यवाद

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

के द्वारा: pkdubey pkdubey

के द्वारा: bhagwandassmendiratta bhagwandassmendiratta

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