मेरा देश मेरी बात !

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"क्या ये हिन्दुस्तान नहीं ? यहाँ हिन्दी का प्रयोग वर्जित क्यूँ है ?"

Posted On: 21 Jun, 2014 Others में

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आज एक नारा जन जन की ज़ुबान पर है, “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” प्रन्तु पिछले कुछ वर्षों से कुछ ऐसे घटनाक्रम घटित हो रहे हैं कि अक्ल चकरा जाती है कि भारत एक है, कि जम्बूद्वीप पर एक साथ तीस भारत बसते हैं I एक राज्य में एक महिला के साथ दुष्कर्म किया जाता है, करने वाला और कोई नहीं राज्य का एक बाहूबलि नेता होता है, न्याए देखिए पीडि़ता जेल में और दुष्कर्मी नेता मौज में, तब राज्य की मुख्य मंत्री एक महिला थीं, केंद्र में सत्ता पक्ष की सर्वेसर्वा (दूसरे शब्दों में कहें तो अप्रत्यक्ष रूप से देश की पर्धानमंत्री) भी एक महिला थीं और देश के सर्वोच्च पद पर आसीन, महामहिम राष्ट्रपति जी भी महिला ही थीं, परंतु विडंबना ये कि अपराधी के खिलाफ अपने स्तर पर कार्यवाही करना तो दूर किसी भी स्तर से एक भी ब्यान कुकृत्य के विरोध में जारी नहीं किया गया, आख़िर मीडिया ही को ये ज़िम्मेदारी निभानी पड़ी, अपने प्रांत के अस्पतालों, विद्यालयों आदि की खैर खबर लिए बगैर, कि वहाँ ,आवश्यक सामान, मशीनें आदि तो दूर, पीने का पानी एवं शोचालयों आदि का कोई परबंध है कि नहीं, एक मुख्यमंत्री द्वारा हज़ारों करोड़ रुपये केवल बुत खड़े करने में खर्च कर दिए जातें हैं, परन्तु देश की किसी संस्था किसी ओहदे किसी अधिकारी का ना तो नियंत्रण ही होता है ना ही हस्तक्षेप, बुद्धि यहाँ भी ओछि पड़ जाती है कि आम जनता, महामहिम राष्ट्रपति जी की देख रेख में है कि आदरणीय पर्धानमंत्री जी की ज़िम्मेदारी है कि राज्य के मुख्य मंत्री जी के रहमो करम पर है I
बहुत पहले तमिलनाडु में प्रत्येक रेलवे स्टेशन पर हिन्दी में लिखे स्टेशनो के नाम पर तार्कोल पुता देखा था, ये वहाँ का हिन्दी विरोध दर्शाता था, हाल ही में फिर से करुणानिधि जी की हिन्दी के प्रति घृणा सामने आई है, दक्षिण तो दक्षिण पिछ्ले दिनो ओडीशा से भी वही स्वर सुनाई दे रहे हैं, प्रतिएक भारतीय बड़े ज़ोर शोर से नारा लगाता है “हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दुस्तां हमारा” हम तन मन धन से राष्ट्रभक्त होने का दIवा करते हैं , क्या यही है राष्ट्रभक्ति का परिचय ? यूँ तो हम राष्ट्रभक्त हैं पर राष्ट्रभाषा से हमें नफ़रत है ! व्यक्ति तो भले ही कोई नुकसान पहुँचा सकता हो, भाषा भला किसी का क्या बिगाड़ेगी, भाषा से कैसा बैर ? भाषा तो व्यक्ति को समृद्ध ही बनाती है I अधिक से अधिक भाषाएँ जानना तो गर्व की बात हैI ऐसा नहीं कि हिन्दी भारतवासियों को आती नहीं, हिन्दी सिनेमा जगत के सभी गीत देश भर के कोने कोने में चाव से गाये, गुनगुनाए जाते हैं, यही अगर पाश्चात्य देशों की भाषा हिन्दी होती तो प्रयास पूर्वक सीख रहे होते सभी जन, स्वार्थ के लिए हम विदेशी भाषा सीख सकते हैं, राष्ट्र हित में राष्र् भाषा सीखने में हम अपमानित महसूस करते हैं I तन ,मन, धन तो दूर की बात है I तो क्या फिर मात्र वोट पाने की चाहत में राष्ट्रभाषा को यूँ अपमानित किया जाता है, सत्ता की लोलुप्ता , राष्ट्रभक्ति एवं राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों से भी उपर हो गई है, बचपन में सुनते थे भौतिकवाद आ रहा है, भौतिकवाद आ रहा है, वाह रे भौतिकवाद, क्या परिवारवाद, क्या समाजवाद , क्या राष्ट्रवाद, सभी को लील लेगा, कभी सोचा न था I

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