मेरा देश मेरी बात !

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प्याज़ भैया, प्याज़ भैया मान जाओ, छोड़ो भी ये गुस्सा ज़रा........

Posted On: 4 Jul, 2014 Others में

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अंधेरा घुप था| हवा सायँ सायँ कर रही थी|आधी रात होने में कुछ ही समय शेष था| एक साया तेज तेज कदमों से एक गोदामनुमा भवन की ओर बढ़ रहा था| दरवाज़े पर पहुँच कर उसने धीरे से दस्तक दी| अंदर से एक कर्कश आवाज़ गूँजी, कौन, कौन है ? आगंतुक स्त्री थोड़ा सहम गई, साहस जुटा कर धीमे से बोली, मैं हूँ ज़रा जल्दी से दरवाज़ा तो खोलो|दरवाज़ा खुलते ही स्त्री लगभग दौड़ती हुई अंदर परवेश कर गई|
कौन हो तुम? मैने पहचाना नहीं|
धीरे बोलो प्याज़ भैया, मैं हूँ, मैं, मोदी सरकार, पहचानोगे कैसे ? मुझे आए तो अभी महीना भर ही हुआ है|
अरे हाँ हाँ, आप ! पर इतनी रात गये ? मुझे बुलवा लिया होता|
क्या कहूँ प्याज़ भैया, मीडिया वालों से बचती बचाती आई हूँ, कम्बख़्त देख लेते तो न जाने क्या क्या छाप देते पहले ही जीना मोहाल कर रखा है|
आप कृपया बैठ जाइए व आदेश करें कि ये ना चीज़ आप के लिए क्या कर सकता है|
आवाज़ सुन कर आलू और टमाटर भी वहाँ आ गये|
नमस्कार, बहन जी, टमाटर ने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया, और साथ ही आलू को एक गिलास पानी लाने को कहा, लगता है प्यास के मारे गला सूख रहा है इनका|
अच्छा है तुम दोनों भी यहाँ हो, मुझे तुम तीनों से ही काम है| पानी का घूँट भरते हुए मोदी सरकार ने विनय पूर्वक उन की ओर देखा|
जाएँगे कहाँ यहीं रहते हैं सदा मेरे साथ, लंगोटिया यार जो ठहरे, हर दुख सुख में साथ ही सहते है हम तीनों| प्याज ने उत्तर दिया|
सरकार ने एक ठंडी आह भरी और बैठते हुए बोली, क्या बताऊं प्याज़ भैया, मैं आजकल बहुत मुसीबत में हूँ| काम का आगाज़ तो बड़े जोश ख़रोश से किया था परंतु आरंभ में ही मुझे मजबूरन कुछ कड़वे फ़ैसले लेने पड़े, पहला तो मुझे रेल भाड़े में वृद्धि करनी पड़ी वरना रेल का पहिया बैठ ही जाता| परंतु जनता जनार्दन को तो थोड़ी सी वृद्धि भी रास कहाँ आती है| उन्हें तो बस विरोध जताना आता है| अभी रेल का घाव हरा ही था कि खबर आई कि इराक़ में दो गुटों में युद्ध छिड़ गया है| तुम्हें तो मालूम ही है कि इराक़ के डीज़ल पेट्रोल पर कितना निर्भर हैं हम| बस क्या था, बाज़ार में डीज़ल पेट्रोल के दाम में भारी उछाल आ गया, और मुझे भी मामूली वृद्धि करनी पड़ गई| उधर मौसम विभाग वाले जले पे नमक छिड़क रहे हैं, कहतें हैं कि इस साल भारी सूखा पड़ने वाला है| अभी दिमाग़ में ये उलझने भरी ही थीं कि मालूम हुआ कि तुम भी बिजली गिराने पर आमादा हो, मुझे क्षमा करना भैया, तुम्हें तो मैं भूल ही गयी थी| भूल गयी थी कि तुम में तो सरकारें गिराने तक की ताक़त है| मुझे पहले ही तुम्हारी शरण में आना चाहिए था| पर अभी भी सोचती हूँ कि अधिक देर नहीं हुई, आप से मेरा अनुरोध है कि कुछ दिन तक धैर्य धरो, और अपनी चाल थोड़ी मंदी कर लो, अपने मित्रों से भी कह दो कि वे भी अपनी इस तुच्छ बहन का ख्याल रखें, बड़ी आस लेकर आई हूँ तुम्हारे पास भैया, कुछ करो वरना बड़ी फजीयत होगी|
प्याज़ हाथ जोड़ कर बोला, बहन जी मेरे हाथ में तो कुछ भी नहीं, जहाँ तक मेरा अनुभव कहता है हर साल इन्हीं दिनों मेरी जरा सी तबीयत नासज होती है और भारत के लोग मेरी बीमारी का फ़ायदा उठा कर मेरे दाम बढ़ने का बहाना बना कर अपने अपने दाम कई गुना बढ़ा लेते हैं, मुझे तो कैटालिस्ट की तरह इस्तेमाल किया जाता है, काम हुआ और फिर से धकेल देते हैं वहीं के वहीं, सबसे पहले तो सरकारी कर्मचारी हर साल अपना 15 से 20 प्रतिशत वेतन बढ़वा लेते है| बॉल काटने वाला अपना मेहनताना बढ़ा लेता है, दिहाड़ी मजदूर अपनी दिहाड़ी बढ़ा देता है, कपड़ों की सिलाई, माल की ढुलाई, स्कूटर, टैक्सी का भाड़ा, सभी बढ़ जाते हैं, आप तो अभी आई हैं, पर मुझे तो सब याद है| दूर नहीं जाते, अभी कुछ वर्ष ही पीछे चलते हैं, 2011 के आरंभ में मैं 80 रुपये किलो तक बिक गया था, तब पनीर 60 रुपये किलो था, आज बढ़ते बढ़ते 260 रुपये किलो हो गया है, दूध 18 रुपये लीटर था आज 36 से 42 रुपये लीटर बिक रहा है, बॉल कटवाने पर तब मात्र 15 रुपये देने पड़ते थे आज 50 से 100 रुपये तक देने होते हैं, दिहाड़ी मजदूर जो उस समय 60 रुपये प्रतिदिन पर आसानी से मिल जाता था, आज 350 रुपये प्रातिदिन वसूल रहा है| टैक्सी जो तब 4 रुपये प्रति किलोमीटर लेती थी आज 12 से 15 रुपये प्रति किलोमीटर लेती है|
और पानी भैयाजी, टमाटर ने बीच में याद दिलाया, गंगा मैया तो पानी का कोई दाम भी नहीं लेती फिर भी 10 रुपये लीटर बिकने वाली पानी की बोतल अब 20 रुपये में बिकती है, इन सब के खिलाफ तो कोई चिल्ल्ल पों नहीं होती, इनके दाम तो बढ़ जाते हैं हम फिर से वही अपने निचले स्तर पर आ जाते हैं|
साल भर तो ग़रीबों का चहेता बन कर रहता हूँ, ये दिन आते ही कुछ मुनाफ़ाखोर मुझ पर अपना अधिकार जमा लेते है और मनमानी चालें चलते हैं|उनके आगे मेरी तो एक नहीं चलती और आप जैसी सरकारें भी उन के खिलाफ कुछ नहीं करती|
फिर भी, कुछ तो सोचो भैया, कोई तो होगा उपाय|मुझे तो सबसे ज़्यादा डर, देश की आधी आबादी से लगता है, वे ही सबसे ज़्यादा तुम्हारे और गैस के नाम पर हैरान करती हैं|
देखा जाए तो वे भी आपकी मजबूरी को नहीं समझती, यदि आप में साहस हो तो उनसे पूछ कर देखिए जो लिपीसटिक वे पहली बार 100 रुपये में लाती हैं, अगली बार 150 रुपये में और उससे अगली बार उसीके 200 रुपये अदा करती हैं, मात्र 10 ग्राम वैसलीन, रत्ती भर खाने वाला रंग और एक बूँद इत्र, वैसलीन के दाम क्या इतनी जल्दी इतने बढ़ जाते हैं, पर कोई इस पर कुछ नहीं बोलता, टूथ पेस्ट को ही लीजीए, 30 रुपये वाली टूथ पेस्ट के साथ 5 रुपये का ब्रश चिपका कर 45 रुपये वसूल लिए जाते हैं अगली बार लेने जाओ तो ब्रश गायब कर दिया जाता है और उसी के 45 रुपये हंसते हंसते दे कर आ जाते हैं आपके बुद्धिमान मतदाता, अगली बार फिर से एक ब्रश चिपका होता है और दाम वसूले जाते है 60 रुपये, वहाँ भी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती, मीठे सोडे के दाम क्या इतनी जल्दी इस हद तक बढ़ जाते हैं ? प्याज के दाम, वो भी अस्थाई तौर पर, और किसी साजिश के तह्त, सरकारें गिराने पर आमादा हो जाते हैं मतदाता|तुम भी तो कुछ बोलो टमाटर भाई, क्या कहते हैं वो तुम्हारी कैचप का कितना तो उत्पादन मूल्य होता है और कितने दाम वसूले जाते है कंपनियों द्वारा|
प्याज भैया, एक किलो कैचप में तकरीबन तीन सौ ग्राम टमाटर डाला जाता है और बाकी कद्दू आदि डाल कर 100 रुपये से 130 रुपये तक वसूले जा रहे हैं आज कल एक किलो कैचप के दाम| इस पर भी किसी को कोई एतराज़ नहीं| ले दे कर हम तीनों के पीछे ही पड़ी रहती है जनता|
अरे आलू तूँ चुप क्यों है कुछ अनुभव तू भी तो बतला|
माताजी, जैसे ही आलू ने बोलना आरंभ किया, टमाटर बीच में बोल पड़ा, बहन जी माफ़ करना ये आलू ज़्यादातर बच्चों के बीच में रहता है न, तभी ये खुद को बच्चा ही समझता है, जब इसके चिप्स बन जाते हैं तो फिर ये सब का अंकल हो जाता है, तब तो इस के दाम भी 200 से 300 रुपये किलो तक पहुँच जाते हैं|
आलू कहने लगा प्याज भैया, बैंगन को ही ले लो, कोई बच्चा इसे पसंद भी नहीं करता और साठ रुपये किलो बिक रहा है जबकि तीन वर्ष पहले तक ये भी 10 रुपये किलो तक बिका करता था| इस पर तो किसी को क्लेश करते नहीं सुना|
कह तो तुम सब ठीक रहे हो, वस्तु के दाम वस्तु के आंतरिक मूल्यों अथवा उत्पादन मूल्यों से कहीं अधिक होते हैं, इस पर विचार करने की आवश्यकता है, परंतु फ़िलहाल तो इस ओर किसी का ध्यान नहीं है, बस तुम्हें लेकर ही देश में घमासान मचा हुआ है, रेडियो, टी वी पर दिन भर प्याज़ ही प्याज़ सुनाई देता है और मुझे सपने में भी लोग हाए हाए करते सुनाई देते हैं| कुछ तो करो भैया, कोई तो सुझाव दो|
आप ने भी कुछ तो सोचा होगा,बहन जी ?
अभी तक तो दो बातें मेरे ध्यान में आती है जिन पर मैने काम भी करना शुरू कर दिया है, एक तो है कि जमाखोरों के गोदामों पर छापे मार कर माल जब्त कर लिया जाए और उन्हें सख़्त से सख़्त सज़ा दी जाए|
इससे क्या होगा ? प्याज़ बोला, दाम तो घट नहीं जाएँगें, आप एक गोदाम से माल निकाल कर दूसरे गोदाम में भर देंगे, साल दर साल मुक़दमा चलेगा, प्याज़ बेचारे बीच में ही दम तोड़ देंगे, आपूर्ति घटते ही क़ीमतें और बढ़ेंगी न कि घटेंगी|
दूसरा उपाए हम ने सोचा है कि प्याज़ को किसान से सीधा उपभोक्ता तक पहुँचाया जाए, बीच के तीन चार बिचौलियों को निकाल बाहर करेंगें तो लागत मूल्य में कुछ तो कमी आएगी|
लागत तो अवश्य कुछ कम हो जाएगी परंतु बीच के जो तीन चार घरों का चूल्हा प्याज़ की वजह से जलता है, उनके बच्चे तो भूखों मर जाएँगे, उनके रोज़गार का भी कुछ इंतज़ाम किया है आपने ?
वो कहाँ से, पहले ही इतनी बेरोज़गारी है इस देश में | काश पहले की सरकारों ने ईमानदारी से कुछ किया होता तो मेरे देश की गिनती शायद विकसित देशों में होती| फिर कोई झंझट भी न होता|
इस गलतफहमी में न ही रहो तो अच्छा है, विकसित देशों की आम जनता का तो और भी बुरा हाल है, वहाँ के लोगों के पास तो एक या दो सप्ताह के राशन की जमा पूंजी मुश्किल से होती है, अपने बच्चों तक की पढ़ाई तक के लिए पैसे नहीं होते उनके पास, सारा देश कर्ज़ में डूबा होता है, सच कहूँ तो वहाँ की सरकारें तो अमीर हैं पर जनता ग़रीब है अपने देश में उल्टा है, लोग एक से एक अमीर पड़े हैं| सरकार ताज़ा कमाती है ताज़ा खाती है| ये भी न समझना कि वहाँ महंगाई नहीं है आशीर्वाद आटे की 10 किलो की थैली जो यहाँ 300 रुपये तक में मिल जाती है वहाँ 10 डालर यानी 600 रुपये की मिलती है| इंजीनियर, डाक्टर का वेतन भी वहाँ 7000 डालर प्रति माह से अधिक नहीं है|
पर वहाँ दाम इतनी तेज़ी से तो नहीं न बढ़ते|
दाम तेज़ी से नहीं बढ़ते तो वेतन भी तो तेज़ी से नहीं बढ़ते, साल भर में 1 या 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दी जाती है बस|
मैं तो समझ जाऊँ प्याज़ भैया, इन मतदाताओं को कौन समझाए, मुझे तो लगता है तुम्हारे दामों को ही मुद्दा बनाकर ही अगले चुनाव में मुझ पर हमले किए जाएँगे, मैने तो देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रेल, विज्ञान सड़कें बिजली आदि की तरक्की को लेकर बहुत से मंसूबे बाँधे रखे हैं, न जाने इतना धन कहाँ से आएगा, अभी तो जल्द ही एक और बम फूटने वाला है, सातवें वेतन आयोग का, राम जाने क्या होगा, अच्छा सच कहूँ तो मैं तो ये गुलाबी धागा तुम्हें राखी बाँधने के लिए लाई थी तुम्हें अपना धरम भाई बनाना चाहती हूँ और उम्मीद रखती हूँ कि अगले पाँच साल तक तुम एक अच्छे भाई की तरह मेरी रक्षा करोगे|
बेचारा प्याज़, मरता क्या न करता, गुलाबी धागे को अपनी कलाई पर बँधते देखता रहा और आश्वासन के सिवा कुछ न दे सका|
धीमी,धीमी आवाज़ में प्याज़ की आरती के स्वर गूंजने लगे|
सुनो अरज प्याज़ भैया, मेरीईईइ….
मैं आई शरण अब तेरीईईईईईई…..



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