मेरा देश मेरी बात !

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बोले भी, तो शेम शेम !

Posted On: 8 Jul, 2014 Others में

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लगता है कांग्रेस की हार अभी तक राहुल जी के गले से नहीं उतर रही है|
“तकिया-ए-मखमल पे जिन्हें मुश्किल से आती थी नींद|
ढूँढते हैं ईंट वो तकिया लगाने के लिए||”
मुझे नहीं लगता कि इस तरह की बचकानी बातें व सस्ती लोकप्रियता उन्हें किसी मुकाम तक ले जाएगी| यदि मुकाबला अपने से उँचे कद के व्यक्ति से हो या बराबर का व्यक्तित्व हो तो अपने व्यक्तित्व को ऊपर ले जाने के दो ही तरीके हो सकते हैं|पहला,या तो दूसरे के कद को मिटाने का प्रयास करते रहिए या फिर अपने कद को ऊँचा खींच ले जाइए| पहले वाला तरीका कोई कारगर तरीका नहीं है| दूसरे का व्यक्तित्व यदि थोड़ा मिट भी जाएगा तो भी निशान बाकी रह ही जाएगा| कभी न कभी उभर ही आएगा| हाँ दूसरा तरीका थोड़ा मुश्किल अवश्य है परंतु असंभव नहीं| उसमे कठिन परीश्रम की आवश्यकता होती है| ज़मीन पर रह कर पसीना बहाना पड़ता है| जितनी जल्दी हो सके अपनी हार को स्वीकार कर लेना चाहिए| मात्र इसलये कि औरों ने सरकार को हैरान करने का जो तरीका अपनाया था आपको भी वही अपनाना है बल्कि देश हित में और यदि वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं तो भी, इस तरह के व्यवहार का त्याग कर, एक गंभीर व संजीदा व्यक्तित्व का परीचय देना चाहिए| पाँच वर्ष का समय है उनके पास, डॅट कर मेहनत करें और दुनियाँ में अपना नाम करें| परिवार अथवा वर्ग का सिक्का प्रजातंत्र में बार बार नहीं चलता| देश जानता है कि 1991 के चुनाव के पहले चरण में लोगों ने कांग्रेस व श्री राजीव गाँधी जी के नाम को नकार दिया था| परंतु दूसरे चरण से पहले उनके आकस्मिक निधन की वजह से कांग्रेस जीत पाई थी, परंतु यकीन मानिए देश चुनाव जीतने की इतनी बड़ी कीमत कभी भी नही देना चाहता| अपनी कथनी व करनी में सामंजस लाने का पर्यास करें,अपने आस पास नज़र रखें| अपने सलाहकारों का मूल्यांकन कर के देखें|आत्म चिंतन व मनन करें| गोस्वामी तुलसी दास जी ने राम चरित मानस में लिखा है:-
“सचिव बैद गुर तीन जौ प्रिय बोलहीं भय आस|
राज धरम तन तीन कर होई वेगहीं नास||”
यदि हमारे सचिव, वैद्य अथवा गुरु भयवश या झूठी प्रशंसा हेतु हमें सच्चाई से दूर रखते हैं| सचिव यदि राज्य में होने वाली घटनाओं व प्रतिक्रियाओं की सही जानकारी नहीं देता तो राज्य का शीघ्र ही नाश हो जाता है| इसी प्रकार अगर हमारा चिकित्सक हमें हमारी बीमारी से,किसी भयवश, हमें अंधेरे में रखता है तो शरीर का नाश निकट ही समझना चाहिए| वो हमारा सुभचिंतक नहीं हो सकता| यदि गुरु हमें प्रसन्न करने हेतु धरम को हमारे हित में तोड़ मरोड़ देता है और चिकनी चुपड़ी बातों से लुभाकर अपना उल्लू सीधा करता रहता है तो हमारे लोक परलोक दोनों नष्ट हुए समझो| इसलिए अपने आस पास एक पैनी नज़र बनाए रखनी पड़ेगी और सोच में दूरदर्शिता लानी चाहिए| सदन के पटल पर शेम शेम चिल्लाना शायद ही कुछ लोगों को भा जाए परंतु देश का बड़ा हिस्सा ऐसे व्यवहार को बचकाना ही मानता होगा|



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