मेरा देश मेरी बात !

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खूब बटी रेवाड़ियाँ, पर दिल तो माँगे मोर |

Posted On: 11 Jul, 2014 Others में

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इधर संसद में वित्तमंत्री जी का बजट भाषण संपन्न हुआ और ज़ोर ज़ोर से मेजें थपथपाने की आवाज़ आने लगी|विपक्ष लाबी में बैठे एक सांसद हड़बड़ा कर उठ बैठे| पास बैठे दूसरे सांसद क्रोधित होते हुए बोले, क्या भाई जब देखो मेजें ही थपथपाते रहते हैं| किसी को चैन से सोने भी नहीं देते| दूसरे ने कहा, भाई मुझे तो बहुत अच्छी नींद आई, बस दो तीन बार, आई प्रोपोज, आई प्रोपोज सुनाई दिया, इसके इलावा नहीं मालूम क्या हुआ| अच्छा ये तो बता तुम्हें अपना उत्तर तो याद है न, अभी बाहर चल कर तुम से भी पूछा जाएगा कैसा रहा बजट|हाँ हाँ अच्छी तरह से होम वर्क कर के आया हूँ मैं, पहला सांसद बोला, दो चार ही तो जुमले हैं जो विपक्ष को बोलने होते हैं, मसलन, खोदा पहाड़……….,आमजन विरोधी या फिर दलित विरोधी वग़ैरा,वग़ैरा| यही तो परंपरा है और परंपरा निभाना हमें बखूबी आता है| लेकिन एक बात है, अपना जवाब देने के बाद जल्दी से खिसक लेना वरना मीडिया वालों के तरकश में स्वालों के इतने तीर होते है, आनन फानन में छलनी कर देंगे| बात करते करते वे दोनों संसद भवन के मुख्य द्वार तक आ गये|वही हुआ जिस का डर था, शीघ्र ही मीडिया कर्मियों ने आन घेरा| एक सांसद के मुख के सामने माइक्रोफ़ोन करते हुए तुरंत प्रश्न दाग दिया,” बजट पर आप की पहली प्रतिक्रिया ?” नेता जी भी तैयार थे| कुछ, कुछ भी तो नहीं है इस बजट में|
ज़रा विस्तार से बताएँगे, क्या क्या नहीं है इस बजट में?
पहले वाले सांसद आगे को बढ़ने लगे तभी दूसरे वाले बोल पड़े, देखो भाई अगर सांसदों के वेतन आदि बढ़ाने का ज़िक्र आता तो हम भी दो दो हाथ मेजें थपथपा लेते, ऐसा तो कुछ था ही नहीं, और हम ये चाहते हैं कि हमारे लिए जो रेल में, जहाज़ में, बसों में, शिक्षण संस्थानों में,मकानों के आंवटन आदि में जो भी कोटा सुरक्षित रखा गया है वो सीमित है , उनपर से सभी सीमाएँ हटा दी जानी चाहिएँ|
हाँ मगर जनता के लिए क्या क्या और होना चाहिए ?
और क्या होना चाहिए ? नहीं मालूम, पर कुछ न कुछ तो और भी होना चाहिए था, भाई जनता की बात जनता से पूछो, वे ही तो ठीक से बता पाएँगे न अपनी ज़रूरतों को|
और बढ़ती महंगाई पर क्या कहना है आपका ?
महंगाई, महंगाई को तो बढ़ना ही चाहिए, वरना हमें मुद्दा कहाँ से मिलेगा, सरकार को घेरने का|
अगला प्रश्न पूछने के लिए मुँह खोला ही था कि नेता जी बोले, बस बस और भी तो सांसद हैं सारा ज्ञान हमीं से लोगे क्या ? कह कर आगे बढ़ गये|
ये मीडिया कर्मी भी, जानते भी है कि इतनी जल्दी कोई टिप्पणी करना कितना मुश्किल होता है, और ये भी जानते है कि विरोध करना ही विपक्ष का कर्तव्य भी है और स्वभाव भी, फिर भी चुटकी लिए बग़ैर नहीं मानते|
इधर गाँव की चौपाल पर तीन बुजूर्गवर बजट पर चर्चा कर रहे थे| मैं भी चर्चा में शामिल होने की गरज से उनके पास जाकर खड़ा हो गया| यूँ ही बात आरंभ करने की मंशा से मैने पूछा, कैसा रहा आज का बजट ? एक बुजुर्ग बोल उठे भाई कहना तो पड़ेगा कि “जेतलि जी का है अंदाज़े बयाँ और” उनके इस वक्तव्य ने विस्मित कर दिया, यूँ ही मेरे देश के ग्रामीण किसान को गँवार व मूर्ख समझा जाता है, गजब की पारखी नज़र रखते हैं गाँव वाले भी| राजनीति ही नहीं अर्थव्यवस्था पर भी उनकी पैनी नज़र रहती है| आम बजट से पहले रेल बजट पर चर्चा हो रही थी| एक बुजुर्ग बोले, बजट से पहले बढ़ा दिए किराये या अब बढ़ाते, बात तो एक ही है, भाई जो माल खरीदेगा महँगा तो बेचेगा भी तो महँगा| रेल चलाने का खर्च अगर बढ़ रहा है तो किराया भी तो बढ़ाना ही पड़ेगा| हमें तो बस यही चाहिए की रेल में यात्रा सुगम और सुरक्षित हो जाए, आए दिन की रेलों में लूटपाट बंद हो जाए और थोड़ा साफ सफाई हो| और के खरीदना सै हमने रेल को ?
बातों बातों में मालूम हुआ कि उनमें से एक भारतीय सेना से रिटायर्ड है जिन्हें वे लोग फ़ौजी कह कर संबोधित कर रहे और एक कालेज में प्रोफ़ेसर रह चुके हैं|
आम बज़ट में किए गये प्रावधान काफ़ी तो नहीं प्रन्तु कुछ हो गये हैं कुछ हो जाएँगे| आम बजट पर फ़ौजी ने टिप्पणी की| परंतु चिंता का विषय तो वही है जो सारे देश के अर्थशास्त्री कह रह है, जो जो सुविधाओं और योजनाओं की घोषणा इस बजट में की गई है| उस पर खरा उतरने में संदेह है| पहले भी वादे बहुत होते रहे हैं पर अमल में ज़ीरो| बस यही उम्मीद है कि जो भी कुछ कहा गया है शत प्रतिशत न सही अस्सी प्रतिशत तो पूरा किया जाए, न जाने कितने नेता अपने मुँह से ये कह चुके है कि एक रुपये में से पंद्रह पैसे खर्च होते हैं बाकी न जाने कहाँ जाते हैं| सही भी है, हम अपनी आँखों से पैसे की बर्बादी होते देखते रहते हैं पर कर कुछ भी नहीं सकते| हमारे हाथ में तो कुछ है नहीं, और पैसा खाने वालों के हौंसले इतने बढ़ चुके हैं कि खून ख़राबा करने से भी नहीं चूकते| इस का हल तो आख़िर सरकार को ही निकलना होगा| खोया पैसा ढूँढना तो आख़िर सरकार को ही होगा, भ्रष्टाचार, अगर केंद्र सरकार दूर कर सके तो उन्नति के द्वार तो अपने आप ही खुलते जाएँगे|
जहाँ तक महंगाई की बात है, अब प्रोफ़ेसर साहब कहने लगे, देश महँगाई के कुचक्र में फँस चुका है| इधर महँगाई बढ़ी उधर वेतन और सेवा शुल्क आदि बढ़ गये,और नोट छापो, और महँगाई, ये चक्र समाप्त नहीं होगा तो एक दिन ऐसा आएगा जैसे इंडोनेशिया में भारतीय सौ रुपये के बदले वहाँ के लगभग 20000/- रुपये मिलते हैं| हमें भी 500, 1000 के नोटों के बदले 5000, 10000 के नोट छापने पड़ेंगे| कोई समय था जब भारतीय रुपया और अमेरीकी डालर की कीमत एक समान थी| सन् 1947 में एक रुपया एक अमेरीकी डालर की कीमत के बराबर था| लेकिन विदेशी सामान की बढ़ती निर्भरता ने हमारे रुपये को नीचे पटक दिया| 1965 से 1975 तक एक डालर की कीमत लगभग 8.00 रुपये और बीस वर्ष पूर्व तक डालर की कीमत आज से आधी थी| लगभग 30-32 रुपये का एक डालर और आज, 60 रुपये प्रति डालर से भी ऊपर है| कुल मिला कर महँगाई का ये बोझ या तो उन पर पड़ता है जिनके पास रोज़गार नहीं होता या फिर किसानों पर पड़ता है जो अपने उत्पाद को एक निश्चित मूल्य पर बेचने को मजबूर हैं| बाकी सब तो अपनी अपनी आमदनी में महँगाई के हिसाब से बढ़ोतरी कर ही लेते हैं| महांगई के इस कुचक्र को किसी तरह तोड़ना आवश्यक है| उस पर भी भारी है देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, निष्क्रियता,एवं विभिन्न योजनाओं के प्रति उदासीनता, उधर राज्यों की मानसिकता को भी बदलने के प्रयास किए जाने चाहिएं ताकि घोषित योजनाओं का सभी देशवासियों को बराबर लाभ मिल सके|
गंगा मैया की सफाई तो बहुत ज़रूरी है, अब फिर से पहले वाले बुजुर्ग बोले, इसके लिए तो सरकार चाहे हमारे उपर विशेष कर लगा दे, हम प्रति व्यक्ति एक निश्चित राशि देने को भी तैयार हैं| जैसे आवश्यकता पड़ने पर देशवासी प्रधानमंत्री कोष या रक्षाकोष में धन जमा करते हैं| ये काम तो युद्ध स्तर पर ही होना चाहिए गंगा माँ का प्रदूषण तो हमारी धार्मिक आस्था व संस्कृति पर कुठाराघात है| ईश्वर करे ये सरकार अपने प्रयासों में सफल हो| दिल का क्या है, इस की ख्वाहिशों का तो अंत ही नहीं|
भगवान दास मेहंदीरत्ता गुड़गावं



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