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गीता का स्तर इतना भी न गिराईए! गीता तो गंगा के समान, सब का हित करने वाली है|

Posted On: 4 Aug, 2014 Others में

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गीता पर राजनीति करने वालों से मेरा अनुरोध है कि गीता का स्तर इतना भी न गिराईए कि संपूर्ण प्राणी जगत के उद्धार के लिए बोली गई वाणी को समझाने के लिए किसी तानाशाह को तक़लीफ़ उठानी पड़े| गीता के अंतिम श्लोकों में भगवान ने स्वयं कहा है कि गीता को किसी ऐसे व्यक्ति को बिल्कुल न पढ़ाया जाए जो इसमें श्रद्धा न रखता हो| गीता को किसी धर्म विशेष, समुदाय विशेष, जाती विशेष अथवा व्यक्ति विशेष से जोड़ना सर्वथा अनुचित होगा| गीता कोई धार्मिक पुस्तक मात्र नहीं, ये प्राणी मात्र के उद्धार हेतु प्रस्तुत किया गया एक दस्तावेज़ है| जब गीता का प्रादुर्भाव हुआ था उस समय तक पृथ्वी पर, हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई जैसा कोई धर्म अथवा समुदाय नहीं था| (सिंधु नदी के किनारे बसी सभ्यता को अरबों ने हिन्दु का नाम दिया क्योंकि उनकी वर्णमाला में {स} अक्षर होता ही नहीं)| उससे पहले से सनातन धर्म की ही पहचान थी| गीता में धर्म की बात अवश्य की गई है परंतु यहाँ मानव धर्म की बात की गई है| भगवान ने कहा है कि पृथ्वी के निर्माण के समय जब प्राणियों को पृथ्वी पर भेजा गया था तो प्राणियों से कुछ आवश्यक कर्म करने की अपेक्षा की गयी थी और इन्हीं कर्मों को निष्ठा पूर्वक निभा लेने को ही मानव धर्म की संज्ञा दी गई है| (इन्हीं कर्मों के आधार पर ही प्राणियों को बंधन या बंधन मुक्त किया जाता है)| गीता को जो भी सही सही समझ लेता है, वो ही इस का मुरीद हो जाता है| भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी के शब्दों में वे प्रति रात सोने से पहले गीता का एक अध्याय पढ़ कर ही सोते हैं| गीता को भारत में ही नहीं विश्व भर में पढ़ा व सराहा जाता है| गीता को पढ़ने के बाद दुनिया को देखने का नज़रिया ही बदल जाता है| जीवन जीने की कला आ जाती है|
गीता में बताया गया है कि केवल हिंदू धर्मावलंबी ही नहीं बल्कि, सभी प्राणी, आख़िर पृथ्वी पर क्यों हैं| जन्म के समय से लेकर, जब तक जीते हैं तब तक, अगर फिल्मी भाषा में कहूँ तो, चक्की पीसिंग एन पीसिंग,एन पीसिंग| और एक दिन वही माटी की माटी! क्यों है ऐसा? ये भी बताया गया है कि कोई भी प्राणी मुक्त नहीं, अपने कर्मों की बेड़ियों से बँधा है और परिणाम स्वरूप दुख व सुख भोगता है| जब कोई कहता है कि अमुक फ़ैसला उसका अपना है वो भी उसका अपना फ़ैसला नहीं होता, हर एक निर्णय बीते हुए कल से बँधा होता है और आने वाला कल उन्हीं निर्णयों पर निर्भर होता है| बंधन व दुखों से मुक्त होने के उपाय भी विस्तार पूर्वक सुझाए गये हैं, गीता में| ईश्वर ने बताया है कि विशेष कर्म और विशेष पद्धति से उन कर्मों का पालन करना ही बंधन मुक्त कर सकता है| या फिर प्रसन्नता पूर्वक जीवन व्यतीत किया जा सकता है|
महाभारत ग्रंथ को तो गीता को अवतरित करने के लिए एक संवाहक के रूप में प्रयोग किया गया है वरना बाकी सब बातें तो मानव जगत के लिए कही गई हैं| अर्जुन को तो भगवान याद दिलाते हैं कि वह एक क्षत्रिय है और उसका स्वभाव युद्ध करना है| जीवन भर युद्धों में उलझता रहा है और अब केवल इसलिए उन आतताइयों का वध नहीं करना चाहता कि वे उसके अपने भाई बांधव हैं तो वह अपने कर्म को न करते हुए अपने धर्म से विमुख हो रहा है| गीता में एक बात और आती है जिसे लेकर लोगों के भिन्न मत हैं| कुछ लोग कहते हैं की समाज को चार वर्णो में बाँटने की बात कही गई है जिससे ऊँच नीच का भेद पैदा हो गया है| ऊँच नीच मानव द्वारा बनाई गई है न कि ईश्वर द्वारा| ईश्वर ने कहा कि संसार में आने वाले प्रत्येक प्राणी को कुछ न कुछ काम अवश्य करना होगा और उसके के बदले प्राणियों के योग क्षयेम का ध्यान ईश्वर स्वयं रखेंगें|सभी प्रकार के कामों को कुल चार श्रेणियों में बाँट दिया गया, कुछ जो अध्ययन अध्यापन का काम करेंगें उन्हें ईश्वर ने ब्राह्मण का नाम दिया और जिन्हें समाज की सेवा का काम सौंपा जाएगा वे शूद्र कहलाएँगे| जो समाज को सुरक्षा प्रदान करेंगें उन्हें क्षत्रिय कहा जाए और जो वस्तुओं के आदान प्रदान व वितरण का काम करेंगे उन्हें वैश्य कहा गया| ये केवल श्रेणियाँ भर है ऊँच, नीच नहीं|मेरे विचार में तो एक चिकित्सक को भी शूद्र की श्रेणी में होना चाहिए क्योंकि वह भी तो समाज का सेवक ही होता है| और यदि एक अनचाहे बाल काटने वाला व्यक्ति शूद्र होता है तो अनचाहा फोड़ा काटने वाला क्यों नहीं?
एक और बात आती है जिस पर कुछ लोग विरोध जताते हैं कि भगवान ने ये क्यों कहा है कि दूसरे का धर्म यदि अपने धर्म से श्रेष्ठ हो तो भी अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए| मैं फिर से याद दिलाना चाहूँगा कि यहाँ किसी प्रकार के समुदाय की बात नहीं की जा रही| यहाँ भी अपने अपने कर्म को ही धर्म कहा गया है| और दूसरे के कर्म को अच्छा जान कर अपने कर्म का त्याग कर और के कर्मों में घुसपैठ करना धर्म नहीं अधर्म होगा| एक अध्ययन अध्यापन करने वाले को अपने कर्म को व्यवसाय नहीं बनाना चाहिए और न ही चिकित्सक जैसे सेवक को अपना सेवा धर्म छोड़ कर व्यापारी बन जाना चाहिए| इसी तरह से सभी तरह के वर्णो पर यही बात लागू होती है कि अपने अपने कर्म को ही ईमानदारी से करना व्यक्ति का धर्म है| एक अन्य उदाहरण द्वारा इसी बात को समझने का प्रयास करते हैं| मान लो कोई आदमी गुरुद्वारे जा कर रहना चाहता है और उसे कोई न कोई सेवा का काम सौंपा जाता है| मान लिया कि उसे जोड़े घर में श्रद्धालुओं के जूते संभालने का काम सौंप दिया जाता है परंतु वह एक पढ़ा लिखा व्यक्ति है और वह गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ करने से लेकर, चँवर ढुराने, लंगर बनाने अथवा अनेकों और काम कर सकने में सक्षम है परंतु उसका धर्म यही कहता है कि उसे इसी काम में श्रद्धा पूर्वक लगे रहना चाहिए| न कि दूसरे कामों को पाने की लालसा करनी चाहिए|
गीता में भी एक ही ईश्वरीय सत्ता की बात कही गई है| गीता में कहा गया है कि एक ईश्वर सर्वोपरि हैं प्रकृति उनकी शक्ति उनके आधीन है जो सब चराचर का संचालन व नियंत्रण करती है| अर्जुन के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान ने ये भी सपष्ट किया है कि यूँ तो उनका कोई आकार नहीं|उन्हें निराकार रूप में ही जानना चाहिए परंतु च्युंके साकार रूप पर ध्यान केंद्रित करना सुगम होता है इसलिए यदि किसी को उनका कोई साकार रूप पसंद है तो इसमें भी कोई बुराई नहीं| भगवान ने केवल साकार रूप में ही पूजन आराधान पर कभी बल नहीं दिया|
जहाँ तक गीता, राम चरित मानस आदि पढ़ने का स्वाल है मैं तो कहूँगा की हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिएं, यदि भावार्थ के साथ इन पुस्तकों को पढ़ा जाए और चिंतन मनन भी किया जाए तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि पढ़ने वालों को ये पुस्तकें एक अच्छे से अच्छे क्रिकेट मैच अथवा अच्छी से अच्छी फिल्म से भी अधिक रोमांचित कर देंगीं|मैं तो गुरमुखी भी पढ़ लेता हूँ और गुरुग्रंथ साहिब का अध्ययन कर उतना ही आनंद उठाया है| पढ़ तो अँग्रेज़ी व उर्दू भी लेता हूँ और बाइबल और क़ुरान शरीफ़ भी पढ़ने का प्रयास किया था परंतु भावार्थ कुछ समझ नहीं आता|परंतु समझ सकता हूँ की ये पुस्तकें भी उतना ही आनंद देने वाली होंगी| गीता कोई और पढ़े न पढ़े मीडिया कर्मियों को अवश्य पढ़नी चाहिए, यकीन मानिए आपको निराशा नहीं होगी| गीता का वर्चस्व कभी समाप्त नहीं होगा और भविष्य में गीता पर आत्मविश्वास से टिप्पणी कर सकेंगे|
एक बार फिर कहना चाहूँगा कि गीता का संबंध किसी धर्म विशेष से नहीं, गीता जगत के सभी प्राणियों के लिए है परंतु मानव के पास समझने के लिए बुद्धि और विवेक हैं इसलिए मनुष्य के लिए गीता का अधिक महत्व है| किसी तानाशाह को इसे बलपूर्वक पढ़ाने की आवश्यकता हरगिज़ नहीं| ये तो गंगा की तरह सब का हित करने वाली है कोई भी लाभ उठा सकता है|
भगवान दास मेहंदीरत्ता
गुड़गाँव



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