मेरा देश मेरी बात !

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पाक से कह दो, काठ की हंडिया बार बार नहीं चढ़ती!

Posted On: 19 Aug, 2014 Others में

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कहते हैं मूर्ख दोस्त से तो समझदार दुश्मन अच्छा| हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में भी कहा जा सकता है कि उसकी समझ को घुन लगा हुआ है| परोपकार की सोचना तो पाकिस्तान की फ़ितरत में ही नहीं है, वह तो अपना ही दुश्मन बना बैठा है और खुद को ही धीरे धीरे विनाश की ओर ले जा रहा है, परंतु समझता है कि बहुत तरक्की कर रहा है| इधर तो भारत से दोस्ताना रिश्तों की उम्मीद रखना और उधर भारत में पनप रही अलगाववादी ताकतों को खुले आम बल देते रहना, इच्छा रखते हो आपसी बात रखने की, मना करने पर भी, बीच में ले आते हो अलगाववादी ताकतों को और गिला ये कि वार्ता रद्द क्यों कर दी गई? ऊपर से ये कहना कि हमेशा से ऐसा होता आया है, इसे कहते हैं चोरी और सीना ज़ोरी| भारत के लिए ये एक चिंता जनक विषय है और इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है| भारत में रह रहे अलगाववादी नेता यदि पाकिस्तान के सगे वाले हैं तो भारत में क्या कर रहे हैं? जे.के.एल.एफ.के नेता यासीन मलिक को कहते सुना कि “सचिव स्तर की बैठक रद्द करने से लगता है कि भारत सरकार कश्मीर मुद्दे पर बात करने के लिए तैयार नही है” आश्चर्य है! कि पाकिस्तान के साथ कश्मीर मुद्दे पर बात करने को रह ही क्या गया है? 1972, में दिल पर पत्थर रख कर ही इसी उम्मीद के साथ, भारत, पाक अधिकृत कश्मीर पर अपना दावा छोड़ने को तैयार हो गया था कि किसी तरह से क्षेत्र में शांति बहाल हो सके| शिमला समझौता दोनो पक्षों की सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था और दोनो देश खुशी खुशी इस मुद्दे पर राज़ी हुए थे| अब अगर पाकिस्तान को शिमला समझौता मंज़ूर ही नहीं है तो पाक अधिकृत कश्मीर पर भारत का दावा बनता है और इस मुद्दे को भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़ोर शोर से उठाना चाहिए| रही भारतीय कश्मीर की बात यदि कश्मीर के कुछ नेताओं की कश्मीर से संबंधित कुछ समस्याएँ व माँगें है तो वे भारत सरकार के साथ सीधे सीधे बात कर सकते हैं और मिल बैठ कर हर समस्या का हल निकाला जा सकता है| यूँ पराय लोगों की अंगुली थाम कर अपने ही देश से देश द्रोह कर के क्या साबित करना चाहते हैं चन्द कश्मीरी नेता? अगर वे अलगाव की बात करते हैं तो सीधे सीधे देश द्रोही की श्रेणी में आते है और अलगाववादियों से किसी तरह की बात करना मुनासिब ही नहीं| दुर्भाग्यवश अगर अब कभी पाकिस्तान से प्रत्यक्ष युद्ध हो तो इसी बात को ले कर हो कि पाक अधिकृत कश्मीर भी भारत का ही हिस्सा है| और इसे हासिल कर के ही रहना है|
रही बात मोदी जी का पाकिस्तानी हुक्मरानों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के स्वाल की| रिश्ते बिगड़ने से पूर्व, किसी को भी अच्छे रिश्ते बनाने का पूरा पूरा अवसर देना एक सकारात्मक सोच है और यही हमारी सदियों से चली आ रही परंपरा भी है| त्रेता युग से शत्रु पक्ष को समस्यायों का शांति पूर्ण हल निकालने का अवसर दिया जाता रहा है| राम रावण युद्ध के दौरान श्री राम ने श्री हनुमान एवं अंगद को रावण के पास शांति दूत के रूप में भेजा था, महाभारत युद्ध में भी स्वयं श्री कृष्ण शांति दूत बन, धृतराष्ट्र के पास गये थे, ऐसा नहीं कि वे सामर्थवान नहीं थे| परंतु शांति का महत्व उनकी मंद बुद्धि की समझ में नहीं आया और संसार ने उनका विनाश अपनी आँखों से देखा| श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी शांति व भाई चारे के संदेश से पहल की तो क्या बुरा किया? ये सामने वाले पर निर्भर करता है कि वह कौन सा रास्ता चुनता है| शाल व साड़ी के आदान प्रदान जैसी सामान्य क्रिया पर कुछ विपक्षी एवं पाकिस्तानी नेताओं का व्यंगात्मक टिप्पणी करना उनके बौद्धिक दीवालिएपन का परिचायक है| उन्हें अपनी सोच पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है|
युद्ध से कभी किसी का भला नहीं हुआ ये सभी जानते हैं| परंतु कुछ लोग युद्ध के लिए उतावले रहते हैं और गाहे बगाहे सरकार को युद्ध के लिए उकसाते रहते हैं| मेरे विचार में तो दुश्मन को उसी की ही लाठी से हांकना चाहिए| हाँ सेना को इतना सक्षम कर देना चाहिए कि वे दुश्मन की हर चाल का मुँह तोड़ जवाब दे सके| सशस्त्र बलों के पास आधुनिकतम हथियार हों, अंधेरे में भी साफ साफ देख पाने वाले उपकरण हों और भौगोलिक प्रस्थितियों के अनुकूल साजो समान से लैस हों| अभी अभी निर्मित द्रओन जैसे उपकरण को पिज़्ज़ा आदि भिजवाने की बजाए सेना के कामों के लिए शीघ्रातिशीघ्र सेना में शामिल किया जाना चाहिए| और सैनिकों को हमेशा याद दिलाते रहना चाहिए कि सामने भाई नहीं एक दुश्मन खड़ा है| समय चाहे युद्ध का हो कि शांति का वह किसी भी कीमत पर यकीन करने के काबिल नहीं| प्रत्यक्ष युद्ध से कितना नुकसान होता है ये भारत और पाकिस्तान दोनो बेहतर जानते हैं| आनन फ़ानन में अरबों डॉलर स्वाहा हो जाते हैं वो पैसा जो देश के विकासशील कार्यों में प्रयोग किया जा सकता था, जिस धन से अनेकों स्कूल, अस्पताल अथवा अन्य कई जनहित की योजनाओं को पूरा किया जा सकता था कुछ लोगों की मूर्खता के कारण बर्बाद हो जाता है| पाकिस्तान अंदर से चाहे खोखला हो चुका हो पर अपने हठ के चलते पिछले 35 वर्षों से लगातार भारत के साथ अघोषित युद्ध किए जा रहा है| जनता की भलाई के लिए अमरीका से माँग कर लिए गये अरबों डॉलर गोला बारूद के रूप में फूँक चुका है| कहते हैं न कि कुत्ते को यदि हड्डी मिल जाए तो वह अपने ही मुँह से बहने वाले खून को हड्डी से निकलने वाला खून समझता रहता है पर हड्डी को नहीं छोड़ता| पाकिस्तान को लगता है कि अपनी नापाक हरकतों से एक दिन भारत पर फ़तह पा लेगा? न जाने किस खुश फहमी में जी रहा है पाकिस्तान| पंचतंत्र में एक कथा आती है कि एक कुएँ में बहुत से मेंढक हो जाने पर, तंग हो कर उनका मुखिया एक साँप को उस कुएँ में ले आता है| साँप रोज एक एक मेंढक को ख़त्म करता जाता है और एक दिन मुखिया और उसके परिवार की भी बारी आ जाती है| ठीक वैसा ही पाकिस्तान भी अमरीका की शह पर कर रहा है, न जाने कब उसे समझ आएगा कि एक दिन रक्षक ही भक्षक बन अमरीका उसीको निगल जाएगा| पाकिस्तान धीरे धीरे अपनी बर्बादी की दास्तां लिखते जा रहा है| उनके द्वारा पोषित, तथाकथित अलगाववादी नेता बातें तो इंसानियत और जम्बहूरियत की करते हैं मगर इनके मायने से वाकिफ़ ही नहीं| अच्छा हो समय रहते वे भी इंसान बन जाएँ और अपने आस पास जम्बहूरियत कायम कर सकें| भारत का दुर्भाग्य ये है कि इस का पड़ोसी एक ऐसा देश है जिस का मानना ये है कि अपना चाहे कितना भी नुकसान क्यों न हो पड़ोसी का भी नुकसान होना ही चाहिए| रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है” बरु भल बास नरक कर ताता| दुष्ट संग जनि देई विधाता||” [ कुटिल के संग से तो नरक भला ], देश वासियों से नम्र निवेदन है, कि आओ इंसानियत के दुश्मनों को पहचान लें और इसे उखाड़ फैंकने के लिए एक जुट हो जाएँ|
भगवान दास मेहन्दीरत्ता
गुड़गाँव|



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