मेरा देश मेरी बात !

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कुछ लोह खोटा, कुछ लोहार खोटा

Posted On: 24 Aug, 2014 Others में

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किसी घटना को छोटी अथवा बड़ी की संज्ञा देने का अधिकार शायद किसी को नहीं| जो घटना एक व्यक्ति को छोटी लग सकती है वही दूसरे के लिए बहुत बड़ी हो सकती है| ईरान और ईराक में हो रहे नर संहार की घटनाओं के मुकाबले कल रात जम्मू क्षेत्र के आरएस पुरा में हो रही बमबारी की घटनाएँ किसी को मामूली लगें परन्तु गाँव वासियों के लिए ये घटना बहुत बड़ी है| अपने बच्चे को सुई भी चुभ जाये तो कलेजा मुंह को आता है| न जाने कुछ संवेदनहीन लोग मासूम बच्चों, अशक्त महिलाओं, व् निरीह जानवरों के साथ किस तरह से तरह तरह के व्यभिचार व् अत्याचार करते हैं? शोषण और दुराचार की घटनाएँ केवल दिल्ली में ही नहीं हो रहीं बल्कि पूरे देश में दिन प्रतिदिन इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं| स्कूलों से, कॉलजों से, देवालयों से, अनाथालयों से इस तरह की घटनाओं की खबरे दिन प्रतिदिन आती रहती हैं| लड़कियां तो लड़कियां लड़के तक भी उनकी दरिंदगी का शिकार होते रहते हैं| क्या अंध, क्या मूक, क्या बधिर, क्या पंगु, क्या विकलांग किसी पर भी तरस नहीं आता जालिमों को| जिस ओर भी नजर जाती है मानो किसी ने देश के सभी स्टेशनों पर एक ही बोर्ड टाँग दिया हो, मेरठ, मेरठ, मेरठ……..
इनमें से कोई भी घटना मामूली नहीं है| दिल्ली में हुए एक दुष्कर्म के मामूली कह जाने के पीछे शायद वित्त मंत्री जी का आशय मीडिया की भूमिका पर चिंता व्यक्त करना था| परन्तु बात निकलती है तो मायने भी हजार हो सकते हैं| एक पुरानी कहावत है, “कुछ लोह खोटा कुछ लोहार खोटा” समाज और प्रशासन अगर इस तरह के पतन के लिए जिम्मेदार हैं तो मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है|सच दिखलाने की कोशिश में मीडिया द्वारा किए गये प्रयास भी कई बार देश की प्रतिष्ठा पर दाग लगाने का सबब बन जाते हैं|
अगर देश की जनता को प्रशासन पर विशवास हो कि कोई भी अप्रिय घटना घटते ही तुरंत कार्यवाही हो जाएगी| और अपराधी को शीघ्रातिशीघ्र एवं सख्त से सख्त सजा मिलेगी और पीड़ित को बार बार शारीरिक, मानसिक, व् आर्थिक तिहरी पीड़ा में से नहीं गुजरना पड़ेगा| या विशवास हो कि गहन पीड़ा सहन करने के बाद भी पीड़ित को इन्साफ मिल जायेगा, तो समाज में शायद इतना आक्रोश दिखलायी न दे | अविश्वास ही आक्रोश का कारण बनता है| समाज को जिन पर विश्वास करना चाहिए वे या तो घूस लिए बगैर टस से मस नहीं होता और अगर कोई अपने अंतर मन के हाथों मजबूर बेचारा अपनी जान जोखिम में डाल कर अपना कर्तव्य पालन करता भी है तो कोई सत्ता का दावेदार उसे धत्ता बताते हुए अपने आकाओं को साफ़ छुड़ा ले जाता है|किसी तरह से कार्यवाही का सिलसिला चल भी निकले तो इंसाफ़ में इतना विलंब होता है कि तब तक न्याय का महत्व ही नहीं रहता| ऐसी बेवसी में कोई दुखड़ा सुनने वाला मिल जाये और यदि दो शब्द सांत्वना के ही मिल जाएं तो जीवन दान मिलने जैसा हो जाता है और ये काम आज मीडिया कर रहा है| प्रशासन अपना काम सही सही और वक्त पर कर दे, तो न तो जनसमूह अपनी बीसियों प्राथमिकताएं छोड़ कर मामूली कह जाने वाले इन कुकृत्यों को इतना महत्व दें और न ही मीडिया को अपना समय और पैसा बर्बाद करना पड़े|अर्थात जनता और मीडिया को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता ही न पड़े| आज देश कि सुरक्षा व्यवस्था का बर्ताव अजीब सा हो गया है| कुछ अपराध तो प्रशासन प्रायोजित हो गए हैं| सत्ता के लोलुप, अपराधियों को पाल कर रखते हैं| वोट नहीं दिया? उठा लो, नेता की नजर में आई जायदाद नहीं बेच रहा, उठा लो, अच्छा कमा खा रहा है? उठा लो, न खाता है न खाने देता है? उठवा लो|ज्यादातर गुस्सा बहन बेटियों पर ही निकलता है| सुरक्षा विभाग चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता| देखा देखि कुछ सुरक्षा कर्मी भी अपराधियों को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझने लगते हैं| कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें आर्थिक लालच तो नहीं होता परन्तु अपने जान माल के जाने के भय से कर्तव्यविमुख हो रहते हैं| कुछ वर्षों से तो अति चिंताजनक एवं निंदनीय आपराधिक घटनाएँ सामने आई हैं| स्वयं पुलिस कर्मी ही कई प्रकार की चोरी डकैती कि घटनाओं में लिप्त पाए गए हैं| कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आप थाने में डकैती की रिपोर्ट लिखवाने गए और सामने कुर्सी पर वर्दी पहने वही आदमी बैठा मिला जो रात डाका डालने घर पर आया था| सरकार का रवैया अधिकतर रोग को दबाने का रहा है रोग को मिटाने का नहीं| किसी इलाके में अपराध हों ही न ऐसा होने नहीं दिया जाता और एक सीमा से अधिक किसी इलाके में अपराधों के आंकड़े दर्ज हो जाएँ तो थाना प्रभारी की शामत आ जाती है| संसद में प्रश्न उठ जाते हैं, कई तरह की प्रशासनिक कार्यवाहियां की जाती हैं| उसका आसान सा समाधान ये है कि रिपोर्ट दर्ज ही न की जाये| तभी पुलिस आपराधिक मामलों को दर्ज करने से भी कतराती है| यदि सरकार अपराध मिटाने की खुली छूट दे दे तो देश के अनेकों देश भक्त सिपाही कर्तव्य पालन में अपनी जान तक न्योछावर कर सकते हैं|
इधर मीडिया की भूमिका को भी निर्दोष, निर्विकार मान लेना भी सही नहीं होगा| मीडिया में भी शीघ्रातिशीघ्र अपना अधिक से अधिक माल बेचने की होड़ लगी है| कहते हैं न कि जोश में होश नहीं रहता| प्रतिस्पर्धा की होड़ में मीडिया अपने ही बनाए नियमों को ताक पे रख नैतिकता को ही भूल जाता है| सभी मीडिया कर्मी जानते हैं कि समाचार वाचक के लिए कोई भी समाचार अच्छा या बुरा नहीं होता| कोई समाचार किसी एक के लिए अच्छा व दूसरे के लिए बुरा हो सकता है| संपादन का नियम तो ये कहता है कि समाचार वाचक को अपने चेहरे के हाव भाव पर भी नियंत्रण रखना चाहिए| परंतु सनसनी फैलाने की होड़ में देश की आन बान और शान को भी ताक पर रख दिया जाता है| शास्त्रों में लिखा है कि: अर्थनाशम, मनस्तापम, गृह दुश्चरितानी:च, स्वयं शाठयम च आपमानम मतिमान न प्रकाशयेत| धन का अत्यधिक नाश हो गया हो, मन में गहरा संताप हो, घर में कलेश हो, किसी ने मूर्ख बना कर ठग लिया हो या फिर किसी ने अपमान किया हो, बुद्दिमान लोग इन बातों का ढिंढोरा नहीं पीटते| धैर्ये से समस्याओं का समाधान ढूँढते हैं या किसी विशेषज्ञ की सलाह लेते हैं| जगह जगह ढिंढोरा पीटने से तो कोई समाधान नहीं मिलता उल्टे जग हंसाई होती है सो अलग| कल ही की घटना को ले लीजिए, पाक द्वारा जम्मू क्षेत्र के एक गाँव पर सीमा पार से हुई गोला बारी को मीडिया द्वारा दिखलाया गया और ये भी दिखलाया कि रिहायशी इलाक़ों को निशाना बनाया गया यहाँ तक तो ठीक था, परंतु गाँव वासियों को बदहवास हालत में इधर उधर दौड़ते हुए, दीवारों की आड़ में छुपते हुए और फ़ौजी बंकरों में रात गुज़ारते हुए दिखलाना सही नहीं था| जिसके साथ बीत रही थी उसके लिए तो चिंता का विषय था परंतु दुश्मन के लिए ये उपहास का विषय बन जाता है| उसके उत्साह को बल मिलता है और वह और ज़्यादा दुस्साहस करने पर आमादा हो जाता है| दुश्मन तक तो, ये संदेश जाना चाहिए कि हम हिन्दुस्तानी उन कायरों की किसी नापाक हरकत से भयभीत नहीं| कुछ निडर गाँव वासियों के शत्रु को चुनौतीपूर्ण ब्यान दिखलाए जाने चाहिएं कि वे इस तरह की घटनाओं के आदि हो चुके हैं अब वे डरते नहीं| दूरदर्शन पर शत्रु के सैनिक हुक्मरानों को अपने देश के बुद्धिजीवी वर्ग के बराबर में बैठा लेना और उनकी घटिया बातों को तवजो देना कतई सही नहीं है| अक्सर देखा जाता है कि अपनी बात रखते रखते दोनो पक्षों में वाक युद्ध शुरू हो जाते हैं| समझदार आदमी को वाक युद्ध से बचना चाहिए| बुजुर्ग कहते हैं कि वाक युद्ध तो गलियों में कुत्ते किया करते हैं| जो कुछ भी कहना हो अपने कर्मों से कर के दिखलाइए| ज़मीन पर कर के दिखलाओ आपका संदेश उन तक अपने आप पहुँच जाएगा|मीडिया को देश की गरिमा का ख़याल रखना चाहिए और मर्यादा में रह कर ही कदम उठाने चाहिएं| सभी मीडिया प्रतिस्पर्धियों की एसोसिएशन होती है, ये तो हम जानते हैं, वरना टी वी के सभी चैनलों पर विज्ञापन एक साथ एक ही निर्धारित समय पर प्रसारित न हों| और न ही एक विशेष तरह के कार्यक्रम जैसे खेल समाचार, मनोरंजन समाचार, अध्यात्म आदि सभी का समय एक ही निर्धारित होता| इसलिए आपस में बात कर के निश्चित किया जा सकता है कि जहाँ देश की आन बान शान का प्रश्न हो आप में से कोई भी बीच बाजार नंगा करने का प्रयास नहीं करेगा| ऐसा ही समझौता अगर सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने की दिशा में भी एक दूसरे को सहयोग देने के लिए हो जाए तो मीडिया राष्ट्र निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है| अति हर बात की बुरी होती है, मीडिया यदि अति से बच कर चले तो किसी मंत्री किसी नेता को मीडिया पर अंगुली उठाने का अवसर नहीं मिल सकता| इस प्रकार समाज के सभी वर्ग एवं सभी संस्थाएँ देश में छाये आक्रोश, असमानता व बेचैनी के लिए बराबर के ज़िम्मेदार हैं| किसी एक को पूर्णतया दोषी ठहराना सही नहीं होगा|सभी के समग्र सहयोग में ही समस्याओं के ह्ल मिल सकते हैं|
भगवान दास मेहन्दीरत्ता
गुड़गाँव|



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