मेरा देश मेरी बात !

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एक था मानव एक थी गाय !

Posted On: 30 Aug, 2014 में

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कस्बे के एक उजड़े हुए पार्क में कुछ पशु गुनगुनी धुप का आनंद ले रहे थे| छोटी उम्र के पशु जुगाली कर रहे थे परन्तु अधेड़ उम्र के पशु डरे सहमें बैठे थे| पार्क के बहार एक नन्ही सी बछिया कहीं कहीं उगा घास का एक एक तिनका बीन रही थी| बछिया ने पार्क में बैठी अपनी माँ पर एक नजर डाली|

न जाने आज माँ को क्या हो गया है सुबह से कुछ खाया है न पिया है किन्हीं ख्यालों में खोई हुई है| ऐसा तो उसे कभी नहीं देखा! पास जा कर बोली माँ आज क्या हुआ है तुम्हें? सुबह से यूँ ही उदास परेशान सी बैठी कुछ सोच रही हो? खाना पीना तो दूर सुबह से अपनी जगह से हिली तक नहीं? साँझ होने को आई, गोशाला में चारा भी आ गया होगा चलो चल कर देखते हैं, मुझे तो बहुत भूख लगी है|

माँ ने एक नजर अपनी लाड़ली की और देखा और धीमे स्वर में बोली, ये आवाजें सुन रही हो?

हाँ माँ ये तो ढोल नगाड़ों की आवाज है, मुझे ये आवाज बहुत अच्छी लगती है| शायद किसी का ब्याह होगा| ये लोग अपना काम होने के बाद सब्जियों के डंठल आदि यहीं तो फैंक जाते हैं| इसी बहाने हमें भी कभी कभी पेट भर खाने को मिल जाता है|

परन्तु आज ऐसा कुछ नहीं होने वाला बल्कि हमारे भूखों मरने के दिन आ गए हैं, गाय ने एक नि:श्वास छोड़ते हुए कहा| इन चेहरों को मैं अच्छी तरह से पहचानती हूँ और इस ढोल की आवाज को भी| ब्याह नहीं, ये चुनाव की जीत का जश्न मनाया जा रहा है| कुछ बरस पहले भी ऐसा ही हुआ था | जब मैं तुम्हारी उम्र की थी तब हमारा सारा का सारा चारा मानव खा जाता था, अब फिर वही लोग और वही ख़ुशी की लहर जो मैंने बरसों पहले देखी थी| अब तो इन्होने कुछ और लोगों के साथ भी हाथ मिला लिया है, राम जाने और क्या होगा अब|

पर माँ गिरी गिरी तो ये लोग पहले ही निकाल लेते हैं हम तो केवल छिलका ही खाते हैं| और मानव को चारा खाते मैंने तो कभी नहीं देखा?

मेरे अनुभव पर शक न करो बेटी, मानव कुछ भी खा सकता है| मुझे लगता है यहाँ से पलायन का वक्त आ गया है| हमें जल्दी ही किसी ऐसी जगह निकल जाना चाहिए जहाँ भर पेट न सही जीवित रहने के लिए कुछ भी मिल जाए| अभी तो रात होने को है,चलो गोशाला चलते हैं सुबह तड़के ही कहीं और निकल चलेंगे|

पर माँ हम जायेंगे कहाँ?

है एक जगह, पिछली बार भी जब ऐसा हुआ था तो कुछ दिन भूखो मरने के बाद मैं और मेरी माँ यहाँ से दूर जंगल की और निकल गए थे| तभी आज मैं जिन्दा हूँ|

अगली सुबह

कितनी दूर निकल आये हैं माँ, मैं तो सुबह से चलते चलते थक गई हूँ | भूख और प्यास के मारे भी बुरा हाल है| घास तो क्या पूरे रास्ते कहीं एक बूँद पानी तक दिखलायी नहीं दिया| जिधर देखो कंक्रीट का जंगल ही नजर आता है हमारे वाला जंगल तो दूर दूर तक दिखलायी नहीं देता| पार्कों में कहीं कहीं हरियाली दिखलायी देती है पर उनके रास्ते इस तरह से बंद कर के रखते हैं ये मानव, आप तो आड़े टेढ़े हो कर निकल जाते हैं, मज़ाल है हम में से कोई घास के नजदीक भी पहुँच जाये| वहां मरते न मरते यहाँ जरूर मर जायेंगे|

इतनी दूर तो नहीं था, यहीं कहीं था वो जंगल, मुझे अच्छी तरह से याद है, बड़े अच्छे से दिन कट रहे थे यहाँ पर एक दिन शहर से एक गाड़ी आई और हम सब जानवरों को कैद कर के उस गोशाला में छोड़ दिया| मुझे इस मंदिर की पहचान है, बस ये मंदिर वैसे का वैसा है बाकी सब बदल गया है| चलो मंदिर की और चलते हैं शायद कुछ खाने को मिल जाये| फिर आगे निकल चलेंगे| पीछे भी तो नहीं जा सकते अब|

साँझ होने को आई माँ, ये पत्थरों के जंगल समाप्त होने का नाम ही नहीं लेते! मैं तो बहुत थक गई हूँ|
अचानक बछिया छलाँगें लगाने लगी, दूर उसे एक हरा भरा जंगल दिखलायी दिया| उत्साह से भर गई और माँ की परवाह किये बगैर दौड़ लगाती हुई जंगल में जा पहुंची|
जैसे ही माँ ने उसे देखा, काटो तो खून नहीं, उसके होशो हवास उड़ गए, जिस पेड़ के नीचे बछिया खड़ी थी वहीँ एक शेर बैठा था| आसमान से टपके खजूर में अटके| गनीमत रही कि शेर अभी सो रहा था और उसकी नजर बछिया पर नहीं पड़ी थी| गाय वहीं रुक गई, बछिया को इशारे से वहां से दूर भाग जाने को कहने लगी| पर वो नादान कहाँ समझती थी| उसे तो अपनी भूख मिटाने कि पड़ी थी|

माँ तुम भी जल्दी से यहाँ आओ न देखो कितनी नरम नरम घास है, बहुत अर्से बाद ऐसी घास खाने को मिली है| इतनी दूर से चल कर आए हैं अब मुझ से तो नहीं रहा जाता|

आखिर माँ को बोलना ही पड़ा, अरे पगली नीचे देख नीचे, तेरे पास जो जानवर बैठा है, एक झप्पट्टा मारेगा और तेरी अंतड़ियां बहार आ जाएँगी| जल्दी से यहाँ से भाग ले वरना, घास तो क्या तूँ इसका एक ही ग्रास बन जाएगी| ये बड़ा ही खूंखार जानवर है| फिर शेर से कहने लगी, जरा रुकना शेर जी मैं वहां आती हूँ, तुम मझे खा लेना मेरी बेटी को जाने दो, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ|

शेर अब तक इनकी बातें सुन रहा था बछिया से बोला, बुला लो माँ को, उसे कहो पास आ जाये अभी मेरा पेट भरा हुआ है| मैं मनुष्य नहीं जो पेट भरे होने पर भी शिकार पे शिकार करता जाऊं| अभी तुम्हें मैं कुछ नहीं कहूँगा| ये जंगल अवश्य है परंतु जंगल राज तो अब शहर में ही व्याप्त है|

परन्तु शेर अंकल अगर आपका पेट भरा न होता तो क्या सचमुच आप हमको खा जाते?

हाँ शायद? भूख मिटाने के लिए खाना ही पड़ता|

हम जानवरों ने आपका क्या बिगाड़ा है जो आप हमें मार कर खा जाते हो ?

आपने तो कुछ नहीं बिगाड़ा, परन्तु ईश्वर ने मुझे वनस्पति खाने वाले जानवरों पर नियंत्रण रखने का कार्य सौंपा है| इसलिए तुम्हें मेरा भोजन बनाया है| वैसे तो मैं जानवरों को न भी मारूं, पर उदर की भूख मिटाने के लिए तो मुझे तुम्हें मारना ही पड़ेगा| अगर मैं वनस्पति खाने वाले जानवरों पर नियंत्रण न रखूं तो आप सब जानवर मिल कर एक दिन वनस्पति का पत्ता पत्ता चर जाओगे और फिर खाने को कुछ भी नहीं बचेगा| तब धरती के सभी जीव भी मर जायेंगे| धरती पर संतुलन बनाए रखना ही हमारा कर्तव्य है इसलिए ईश्वर ने कुछ माँसाहारी जानवरों को बनाया है | बाघ और तेंदुआ आदि भी इस काम में मेरी मदद करते हैं|

फिर भी जानवरों को खाना तो अच्छी बात नहीं न शेर अंकल, आप भी हमारी तरह घास फूस खा कर जीवित रह सकते हैं|

मुझे कोई शौक थोड़े ही है जानवरों को मारने का उल्टा मुझे जानवरों को पकड़ने में कितनी मशक्कत करनी पड़ती है आप नहीं समझ सकेंगें| प्रत्येक जानवर अपनी जान बचाने के लिए इतना दौड़ाता है, इतना दौड़ाता है कि पसीने छूट जाते हैं| कभी कभी तो दो दो दिन तक भूखों रहना पड़ता है मुझे भी | वनस्पति खाना आसान है| न तो पेड़ पौधे चल कर कहीं जाते हैं और न ही चूं चपड़ करते हैं, चुप चाप नुचते रहते हैं| परन्तु क्या करूँ आप जैसे वनस्पति खाने वाले जानवरों का हद से बढ़ जाना भी तो सृष्टि के लिए खतरा है|

तो क्या शेर अंकल, मानव का पेट कभी नहीं भरता? वो तो अपने खाने के इलावा हमारा चारा भी खा जाता है|

ऐसा ही है मानव, उदर की भूख नहीं उसे तो नियत की भूख है|

नियत की भूख क्या होती है शेर अंकल?

नियत की भूख वो होती है बेटी जिसमें जितना खाते जाओ भूख उतनी और बढ़ती जाती है| इसलिए नियत की भूख कभी शांत नहीं होती| देखो अब तो मैंने तुम्हें बेटी भी कह दिया है तुम चाहो तो मुझ पर विश्वास करके मेरे साथ रह सकते हो| मेरे भी तुम्हारे जैसे दो बच्चे थे, एक दिन शहर से एक कुछ मानव आए और मेरे दोनों बच्चों को धोखे से बाँध कर ले गए| उनकी माँ बेचारी, उनके गम में पागल सी हो गई थी और उनका पीछा करते करते शहर में पहुंच गई| वहां के लोगों ने उसे आदमखोर समझ कर मार डाला, तब से मैं भी अकेला हूँ| मेरे साथ बात करने वाला भी कोई नहीं वैसे भी सभी जानवर मारे डर के मुझ से दूर दूर भागते है| तुम मेरे साथ रहने लगो तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि मेरे जीते जी तुम पर आंच नहीं आने दूंगा|

गाय जो इतनी देर से उनकी बातें सुन रही थी, मन में विचार करने लगी कि लगता तो भला मानस हैं परन्तु इससे दूर रहने में ही भलाई है| जाने कब किसी के अंदर का हैवान जाग उठे| कहने लगी, नहीं नहीं भैया, हम आपको और कष्ट नहीं देना चाहते, आपने हमारी जान बक्श दी यही आपका बड़प्पन है| हम जंगल के किनारे बसे किसी गाँव कि शरण में अपना गुजर बसर कर लेंगे| इतना कह कर गाय अपनी बछिया को लेकर गाँव की और निकल पड़ी| गाँव के बाहर ही उन्हें एक आदमी मिला, गाय और आदमी की आँखों ने एक दूसरे को पहचान लिया| ये तो सिमरन है, वही गाय, जिसे मेरे बाबा ने पैसे के आभाव में बेच दिया था उस समय हम दोनों छोटे थे और हम दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई थी| जिसके जाने के बाद मैंने कई दिनों तक खाना भी नहीं खाया था| सोरेन के मानसपटल पर पूरी तस्वीर उभर आई| उसने आगे बढ़ कर गाय के गले की रस्सी को थाम लिया, गाय भी सोरेन के बालों में अपनी जीभ फिराने लगी और उसकी आँख से आंसू की एक बूद टपक गई|

मैं न कहती थी माँ, कि सभी मानव भी दरिंदे नहीं होते| बछिया चहकते हुए बोली|

भगवान दास मेहँदीरत्ता
गुड़गांव|



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