मेरा देश मेरी बात !

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ये कौन सैयाद आ गया है चमन में ?

Posted On: 7 Sep, 2014 Others में

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पिछ्ले कुछ माह से जागररण जंक्शन के रीडर ब्लाग नामक मंच पर विचरण करते समय मुँह का स्वाद एक दम कड़वा हो जाता है| जाने किसी की नज़र लगी है कि, इसके परिंदों पर किसी सैयाद की जालिम निगाह पड़ गई है| अक्सर, जो खेलना नहीं जानते उन्हें दूसरों का खेल बिगाड़ने मे ही आनंद आता है| परंतु खुद को आनंदित करने का ये दुनिया का सब से घटिया तरीका है| माना कि जागरण जंक्शन रचनाकारों के लिए एक ऐसा खुला मंच है जहाँ मुझ जैसे किसी भी ऐरे गैरे, नथु कैरे को अपने मन के भावों को रखने की छूट है| परंतु प्रत्येक खेल के कुछ नियम क़ायदे भी होते हैं| इस सन्दर्भ में मुझे श्याम सुंदर जी की एक कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं,
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बोलिए तो तब जब, बोलिबे की सुध होई |
न त मुख मौन गहि, चुप होई रहिए ||
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जोरिय तो तब जब, जोरिबे की जान परे |
तुक छन्द अरथ, अनूप जा में लहिए ||
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गाइए तो तब जब, गाइबे को कंठ होई |
श्रवण के सुनत ही, मन जादू गहिये ||
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तुक भंग, छन्द भंग, अरथ मिले न कछु |
सुंदर कहत ऐसी वाणी नहीं कहिए ||
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यूँ तो उपरोक्त कविता में रचना के बहुत से नियमों का विस्तृत खुलासा कर दिया गया है परंतु इस मंच पर सभी खिलाड़ी हों, ऐसी तो कोई शर्त भी नहीं, मुझ जैसे अनाड़ी भी जब जी चाहे इस खेल में हिस्सा ले सकते हैं| परंतु यूँ बीच मैदान में आकर जगह जगह उल्टी कर जाना, ये तो कोई खेल भावना न हुई| मेरा आशय उन शरारती तत्वों से है जिनका न कोई सिर होता है न पैर, न भाषा, न कोई विषय वस्तु, न नाम, न कोई तस्वीर, और न ही भावना| न जाने क्या सूझता है उन्हें, कि बीच मैदान आकर मलबे से भरा ट्रक उडेल कर चल देते हैं| देवनागरी नहीं आती न सही, रोमन लिपि ही सही पर कुछ तत्व तो हो| ईश्वर जाने, क्या कहना चाहता है कहने वाला और किस ग्रह अथवा लोक की भाषा के संवाद होते हैं? शायद ही कोई समझ पाता हो| न जाने साबित क्या करना चाहते हैं वे लोग? केवल शरारत ही उनका मकसद है क्या? ऐसे लोगों से मेरा करबद्ध अनुरोध है कि भगवान के वास्ते मत लज्जित करो उस माँ के दूध को जिसने अधिक नहीं तो कम से कम नौ मास तक तो तुम्हारा बोझा ढोया ही होगा| किसी माँ ने कभी ऐसी सीख नहीं दी होगी| ये भी आतंकवाद नहीं तो और क्या है? मेहरबानी कर के कोई और कोना ढूँढ लें| “वलड वाइड वेब” का इतना विशाल समंदर पड़ा है |

मुझ ही को गौर से देखा जला जब परवाना
तुम्ही इक महफ़िल में मर्दमशुमार बैठे हो|

ठीक है इस मंच पर आवा जाहि पर कोई रोक टोक नहीं पर इंसानियत भी तो कोई चीज़ होती है| मंच पर आइए स्वागत है सभी का, परंतु मंच पर विचरने वाले अन्य लोगों की भावनाओं का भी ख्याल रखना चाहिए|

जागरण जंक्शन के संयोजकों से अनुरोध है कि इस समस्या पर नज़र रखें एवं येन केन, कोई न कोई हल निकालने का प्रयास करें| कॅंप्यूटर प्रोसेसिंग करने वाले अनुभवी लोग अवश्य ऐसे तत्वों को दूर रखने का कोई न कोई हल सुझाएँगे| मंच को प्रयोग करने का एक मामूली सा शुल्क भी रख दिया जाए तो मुफ़्त खोर तो स्वयं ही भाग जाएँगे| वे न गये तो कुछ संजीदा लोग अवश्य छोड़ जाएँगे| खेल तो आनंद के लिए खेले जाते हैं| रचनाएँ भी आनंद ही के लिए रची एवं पढ़ी जाती हैं आनंद ही न आए तो कैसा खेलना और कैसी रचना ?
भगवान दास मेहन्दीरत्ता



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