मेरा देश मेरी बात !

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बुझे हुए कोयले (एक कहानी)

Posted On: 8 Mar, 2015 Others में

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फुलवा आज बहुत खुश थी| पूरे पंद्रह महीने के बाद राम खिलावन आज उसे अपने साथ शहर लिवाने के लिए आया था| शादी के ठीक दसवें दिन ही, जल्दी ही वापिस आने का आश्वासन दे कर, शहर लौट गया था| आज शाम को ही राँची से वापसी की गाड़ी थी| फुलवा ने जल्दी जल्दी ज़रूरी सामान समेटना शुरू कर दिया| ज़्यादा ज़रूरी तो फुगना का सामान था| अब वह अकेली जो न थी| राम खिलावन की मां ने प्यार से पोते को फुग़ना का नाम दिया था| फुगना अब छ: महीने का हो गया था| दो उपर और दो नीचे के चार दाँत भी निकाल चुका था| अब उसकी ज़रूरतें पहले से ज़्यादा थीं| फुगना थोड़ा चिड़चिड़ा हो गया था, माँ की गोद से उतरना ही नहीं चाहता था फिर भी फुलवा सामान समेटने के साथ साथ सुहागन के लिए ज़रूरी शृंगार करना भी नहीं भूली थी| सिंदूर और बिंदिया तो उसके पास थे, लिपस्टिक और काजल उसने लाला की बहु से माँग लिए थे, “शहर जा कर तो वह अपने लिए जी भर के खरीदारी करेगी” सोच कर फुलवा के ओंठ मुस्कान के साथ फैल गये| नई जगह जा रही थी, आख़िर वहाँ के लोग भी क्या सोचेंगें?
शहरों की चकाचौंध यूँ तो टी वी पर वह कई बार देख चुकी थी, परंतु शहर कभी गई नहीं थी| उपर से एक लंबे अरसे के बाद पति के साथ रहने का सुख, फुलवा खुशी से फूली नहीं समा रही थी| राँची पहुँच कर गाड़ी में स्वार होने तक कोई विशेष परेशानी तो नहीं हुई, परंतु जनरल डिब्बा होने के कारण भीड़ इतनी थी कि लोग एक दूसरे के साथ साथ सटे हुए बैठे थे, लेटना तो दूर पाँव तक फैलाने की जगह नहीं थी, उधर फुगना पूरी रात फुलवा की ही गोद में सोता रहा, रात भर फुलवा की आँख तक नहीं लग पाई थी|
समय की एक अच्छी बात है, जैसा भी हो बीत ही जाता है| सुबह करीब नौ बजे गाड़ी नई दिल्ली स्टेशन पर आ लगी| सभी यात्रियों ने सुख की साँस ली| राम खिलावन अपना सामान संभाल कर रेलवे लाइन के साथ साथ हो लिया, फुलवा भी फुग़ना को गोद में लिए पीछे पीछे चल दी| दो घंटे तक राम खिलवान बिना रुके रेलवे लाइन के साथ साथ चलता रहा, फुलवा बहुत थक चुकी थी, उसकी निगाहें चारों ओर अपने सपनों के घर जैसा कुछ ढूँढ रहीं थीं| न जाने कब आएगा हमारा घर, उसने मन ही मन सोचा| राम खिलवान की झुग्गी स्टेशन से कोई पाँच छ: किलोमीटर दूर थी पूरा का पूरा रास्ता उसने पैदल चल कर तय किया था| आख़िर एक जगह आ कर वह थम गया| फुलवा ने अपने चारों ओर नज़र घुमाई, जनरल डिब्बे की स्वारियों की तरह एक के साथ एक झुग्गी सटी हुई खड़ी थी| छतें अधिकतर प्लास्टिक की काली पन्नियो से ढकी हुई थीं| दुर्गंध तो इतनी फैली हुई थी मानों आस पास कोई जानवर मरा पड़ा हो| एक पल भी वहाँ खड़ा रह पाना मुश्किल हो रहा था| चारों ओर गंदगी के ढेर और नालियों से रिस्ता काला बदबूदार पानी, फुलवा ने प्रश्न भरी निगाहों से राम खिलावन की ओर देखा|
बस पहुच गये, कहते हुए राम खिलावन एक झुग्गी में घुस गया| सामान ज़मीन पर रख, ज़मीन पर बिछी चटाई झाड़ कर बैठ गया| सीलन और घुटन भरी झुग्गी में फुलवा को मतली सी आने लगी परंतु बाहर आने का साहस वह नहीं जुटा पाई| राम खिलावन ने कहीं से एक बाल्टी पानी ला कर दिया, हाथ मुँह धोकर फुलवा ने गुड़ चिवड़ा निकाला और दोनो खाने लगे| गाड़ी में भी भीड़ होने की वजह से वह कुछ नहीं खा पाई थी| रात भर के थके होने के कारण चटाई पर लेटते ही उन सब को नींद आ गई| जब आँख खुली तो सांझ होने को थी|
“घर गृहस्थी का समान लेने जा रहा हूँ”, कह कर राम खिलावन घर से बाहर निकल गया|
फुलवा बिखरा सामान समेटने लगी| घर में कुछ बर्तन थे तो ज़रूर पर वर्षों से उनका इस्तेमाल नहीं हुआ था| उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर शुरू करे तो कहाँ से| झाड़, बुहार कर उसने झुग्गी में बैठने के काबिल जगह बनाई| अब तक काफ़ी अंधेरा हो चुका था| राम खिलावन अभी तक भी नहीं आया था| फुग़ना काफ़ी देर से ज़ोर ज़ोर से रो रहा था उसे जोरों से भूख लगी थी परंतु घर में अन्न का एक दाना न था| वह घर में रखे प्रत्येक बर्तन को कई कई बार टटोल कर देख चुकी थी| हाँ, सफाई करते वक्त उसे यहाँ वहाँ से पचासों शराब की खाली बोतलें अवश्य मिली थी जिन्हें उसने एक टोकरे में इकठ्ठा कर दिया था| फुग़ना को बहलाने की कोई भी तरकीब काम नहीं आ रही थी जितना वह उसे बहलाने की कोशिश करती वह उतनी ही ज़ोर से रोने लगता|
साथ की झुग्गी में रहने वाली सारधा बी अभी अभी काम से लौट कर आई थी| उसने बच्चे के रोने की आवाज़ सुनी तो झुग्गी के अंदर चली आई|
फुलवा को देखते ही समझ गई कि ये राम खिलावन की पत्नी और बच्चा ही होंगे| वह सब जानती थी कि राम खिलावन इस समय कहाँ पर होगा और बच्चा इतनी ज़ोर से क्यों रो रहा है| उसे पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ी कि उन्हें क्या चाहिए| वह अपनी झुग्गी से थोड़े उबले हुए चावल और बच्चे के लिए चावल का पानी ले आई| एक छोटा सा दिया भी अपने साथ लेती आई|
चावल फुलवा को देते हुए बोली, ” राम खिलावन का इंतजार मत करना, उसका कोई ठिकाना नहीं कब आए, और हाँ, तुम ये भात ज़रूर खा लेना, दूध पीने वाला बच्चा तुम्हारी गोद में है, तुम नहीं खाओगी तो ये भी भूखा रह जाएगा और यूँ ही रोता रहेगा|”
“इधर ला मैं ही पिला देती हूँ तेरे मुन्ने को चावल का पानी,” कह कर साराधा बी, मुन्ने को फुलवा गोद से उठा कर चावल का पानी पिलाने लगी| मुन्ने को शांत कर साराधा बी अपनी झुग्गी में लौट गई|
फुलवा संदूक के साथ पीठ सटा कर राम खिलावन का इंतजार करने लगी| धीरे धीरे दिये का तेल भी समाप्त हो गया अब केवल बाति से धुएँ की एक लकीर उठ रही थी| अभी भी राम खिलावन का कोई पता नहीं था| बैठे बैठे पल भर को उसकी आँख लग गई, तभी उसे झुग्गी के बाहर कुछ शोर सुनाई दिया फुलवा ने बाहर झाँक कर देखा दो लोग राम खिलावन को झुग्गी के दरवाजे पर छोड़ कर जा रहे थे| वह जैसे तैसे उसे अंदर लिवा लाई परंतु राम खिलावन रेत की दीवार की तरह चटाई पर ढेर हो गया| उसे कुछ भी होश नहीं था|
फुलवा को रात भर नींद नहीं आई| शहर आने का उत्साह अब तक फुर्र हो चुका था| एक दिन में बिताए हुए ये पंद्रह घंटे विवाह के पिछले पंद्रह महीनों को एक एक कर चलचित्र की भाँति उसके सामने ले आए थे| मुश्किल से अठारह की हुई थी जब पंद्रह माह पहले राम खिलावन से उसकी शादी हुई थी| जल्दी ही साथ ले जाने का आश्वासन दे कर वह तो शहर लौट गया था| शहर गये हुए एक माह बीत गया परंतु राम खिलावन ने एक फूटी कौड़ी नहीं भेजी थी| घर खर्च लाला की उधारी से ही चल रहा था| अब तक तो वे दो ही जीव थे, राम खिलावन की माँ और फुलवा, परंतु जब से उसे पता चला था कि जल्दी ही एक नया मेहमान और आने वाला है तो फुलवा की चिंता और भी बढ़ गई थी|
परंतु आने वाला जीव अपना नसीब साथ ले कर आया था| फुलवा के मायके के गाँव से सरजू पंसारी का परिवार गाँव छोड़ शहर बसने जा रहा था| उनके पास एक गाय थी जिसे वे बेचना नहीं चाहते थे| उनका विचार था कि शहर में पाँव जमने के बाद वे गाय को ले जाएँगे| इसलिए वे गाय की देख भाल के लिए गाय को फुलवा की मां के सुपुर्द कर गये थे| फुलवा की माँ ने गाय को फुलवा के पास भिजवा दिया था| फुलवा गाय की खूब देख भाल करती और लाला की उधारी उतारने के लिए थोड़ा दूध लाला को देने लगी| लाला के परिवार को गाय का दूध इतना पसंद आया कि लाला पूरा का पूरा दूध लेने लगा| फुलवा जब भी लाला की दुकान पर जाती, लाला एक ही बात कहता, ” फुलवा तेरी गाय का दूध तो बहुत मीठा है, हमारा तो चीनी का खर्च ही आधा रह गया है|” दूध के बदले में फुलवा लाला की दुकान से अपनी ज़रूरत का सामान ले लेती और बाकी पैसे उसी के पास जमा रहने देती| इस तरह से घर का गुजर भी हो रहा था और सासू मां की दवा दारू का खर्चा भी चलता रहता| गुजर जैसा भी हो रहा था पर फुलवा अपनी सास की सेवा में कोई कसर नहीं रख छोड़ती थी, फुलवा की सास भी बहु का बहुत मान करती थी, करती भी क्यों न, बेटा तो निकम्मा निकला, एक बहु का ही सहारा था उसे अब| घर भी साफ सुथरा था, नित प्रतिदिन वह घर को बुहारती और सप्ताह में दो बार लिपाई पुताई भी करती थी|
समय बीतते देर नहीं लगती| राम खिलावन की बाट जोहते नौ माह बीत गये, घर में एक पुत्र का जन्म हुआ| राम खिलावन के पास कई संदेश भेजे गये परंतु न तो वह स्वयम् आया न ही कोई पैसा ही भेजा| बस इतना संदेश हर माह आता था कि अगले माह कुछ पैसा ज़रूर भेज दूँगा| देखते देखते पाँच माह और बीत गये| अचानक राम खिलावन की मां बीमार पड़ गई| गाँव के वैद्य हकीमों ने जवाब दे दिया| शहर ले जा कर अँग्रेज़ी इलाज करवाने की ज़रूरत थी| परंतु राम खिलावन का कुछ पता नहीं था| आख़िर एक दिन जिंदगी हार गई| राम खिलावन को संदेश भेजा गया, वह आया भी, पर अंतिम संस्कार के लिए एक पाई न थी उसके पास| आज भी फुलवा की जमा पूंजी ही काम आई उसने किसी बात की कमि नहीं आने दी थी| राम खिलवान ने दिल खोल कर खर्च किया| बिरादरी वाले राम खिलावन की वाह वाह करते हुए जा रहे थे|
मां के अंतिम संस्कार के बाद वह बहुत परेशान हो गया| उसकी चिंता थी कि इतनी उधारी उतरेगी कैसे| फुलवा ने ही अपनी जमा पूंजी के बारे में उसे बता कर पति की चिंता को दूर किया था, परंतु राम खिलावन की तो बांछे खिल गईं| वह फुलवा को साथ ले जाने का बहाना कर के लाला से हिसाब कर के पूरा पैसा ले आया और साथ ही गाय का सौदा भी कर आया था| पूरी रकम अँटी में डाल, वापिस शहर चला गया| फुलवा को कुछ भी नहीं बताया| ये तो लाला ने उसे कुछ दिन बाद बताया कि गाय अब उनकी हो गई है और राम खिलावन सारा पैसा भी ले गया है और कुछ ही दिनों में वह उसे अपने साथ ले जाने वाला था|
माँ की मृत्यु के एक महीने बाद कल ही उसे लेकर शहर आ गया था| “राम जाने पैसे का क्या किया होगा| कभी होश में आए तो पूछूँ,” सोचते सोचते कब सुबह हो गई उसे पता ही नहीं चला| आस पास से काफ़ी लोग अपने अपने औजार ले ले कर काम पर जाने लगे थे| पर राम खिलावन अभी भी बेसुध पड़ा था|
काम पर जाने से पहले साराधा बी फुलवा को देखने चली आई और उसके लिए कुछ खाने को भी लेती आई थी| “ देखो फुलवा, तुम्हारा पति तो तुम्हारी रोटी का इंतज़ाम करेगा नहीं, वह तो तुम्हें लाया ही इसीलिए है कि तुम मेहनत मजूरी कर के अपना भी पेट पालो और इसका भी| इसलिए उठो और कोई काम तलाश करो, रोज रोज कोई खाना नहीं देगा|” सारधा बी फुलवा को खाना देते हुए बोली|
” पलम्बर का काम करता था राम खिलावन शादी से पहले, अपने औजार गिरवी रख के शादी करने गया था, वापिस आकर पलम्बर का काम तो कर नहीं सका और बेलदारी में उसका मन नहीं लगता था, अपनी खीज मिटाने के लिए शराब पीने लगा| अब तो सुना है अमीर बनने की जल्दी में जुआ भी खेलने लगा है| मां के मरने के बाद जो पैसा वह गाँव से लाया था उसे तो एक हफ्ते में ही ठिकाने लगा दिया था उसने|” सारधा बी ने एक ही सांस में राम खिलावन की सारी कहानी कह दी|
फुलवा के पाँव तले ज़मीन खिसक गई| इतने बड़े शहर में वह तो किसी को जानती भी नहीं, काम कहाँ से तलाश करूँगी ? मन ही मन सोचने लगी|

“मुझे तो देर हो रही है, मैं भी कोशिश करती हूँ, तुम भी बाहर निकल कर काम की तलाश में लग जाओ|” कह कर सारधा बी काम पर निकल गई|

बच्चे को गोद में उठाए फुलवा दर दर भटकती रही परंतु किसी से काम माँगने का साहस नहीं जुटा पाई| सड़कों पर चलते चलते दो बज गये, भूख भी जोरों से लग आई थी और फुग़ना का भी रो रो कर बुरा हाल था| आस पास से गुजरने वाले लोग नसीहत दे जाते कि “बच्चे को कुछ देती क्यों नहीं, कब से रो रहा है|”

राह में चलते चलते उसे कहीं खाना बनाने की सुगंध आ रही थी उसने देखा बहुत से लोग वहाँ से जा रहे थे| फुलवा ने सोचा ज़रूर यहाँ कोई शादी ब्याह होगा| यहाँ कोई न कोई काम अवश्य मिल जाएगा| साहस जुटा कर उस पंडाल के प्रांगण में घुस तो गई परंतु वहाँ अब केवल तीन चार लोग एक तंदूर से कोयले निकाल कर उनपर पानी डाल चुके थे और खाली तंदूर को एक रिक्शा में डाल कर ले जाने की जल्दी में थे|
फुलवा ने हिम्मत कर के रिक्शा वाले से पूछ ही लिया ” यहाँ शादी है क्या कोई ?”
“नहीं, तेहर दिन पहले किसी की मृत्यु हो गई थी आज उनकी अंतिम क्रिया थी यहाँ,” रिक्शा वाले ने ज्वाब दिया|
“यहाँ कोई काम मिल जाएगा ?” फुलवा ने पूछ ही लिया|
“हम तो तुम्हें कोई काम दे नहीं सकते और सेठ लोग तो सभी चले गये हैं अब तक, पहले आती तो शायद बात बन भी सकती थी|” उनमें से एक ने कहा और वे जल्दी से निकल गये|
क्या करे क्या न करे, वह वहाँ खड़ी खड़ी सोचने लगी| अचानक न जाने उसे क्या सूझी, वह नीचे बैठ कर राख में से बुझे हुए कोयले बीनने लगी| वह सोच रही थी कि अगर घर में कुछ पकाने को होगा भी, तो, ईंधन भी कहाँ है कुछ पकाने के लिए| ये कोयले शायद कुछ काम आ जाएँ| फुलवा ने कोयले इकठ्ठे कर के एक थैली में भर लिए और निराश मन से घर की ओर चल दी| घर पर न तो खाने का कोई सामान ही आया था और अब उसे कोई उम्मीद भी नहीं थी| राम खिलावन कहीं आस पास भी नहीं था न ही उसने किसी से जानने कोशिश की| चटाई पर लेट कर रात होने का इंतजार करने लगी|
अंधेरा हो गया था पर राम खिलावन का कुछ पता नहीं था| थोड़ी देर में सारधा बी काम से लौट आई थी| जैसे ही वह राम खिलावन की झुग्गी में घुसी, फुलवा उठ कर बैठ गई| कोयले की पोटली को अपने घुटने के नीचे छिपाने का असफल प्रयास करने लगी|
सारधा बी समझ गई, इतनी जल्दी कोई काम तो मिलने वाला नहीं था पर वह कहीं गई ज़रूर थी|
“ क्या है पोटली में ?” सारधा बी ने उत्सुकता से फुलवा की ओर देखा|
फुलवा उसके सामने कुछ छुपा नही पाई और थैली बी के हवाले कर दी| थैली में कोयले देख कर सारधा बी ने एक नज़र फुलवा की ओर देखा| फुलवा नज़रें झुकाए बैठी रही|
“ कोयले खाने से भूख नहीं मिटती, हाँ, पर, इन कोयलों को देख कर मुझे तुम्हारे लिए कुछ काम समझ आ गया है| जब तक कोई और काम नहीं मिलता तुम भुट्टे बेचने का काम कर सकती हो, एक जाली का टुकड़ा भी रखा है मेरे पास, कल मेरे साथ चलना मैं तुम्हें सब समझा दूँगी|” सारधा बी हौंसला बढ़ाने के अंदाज़ में बोलीं|
फुलवा प्रश्न भरी नज़रों से सारधा बी की ओर देखती रही|
सारधा बी ने खाली बोतलों की टोकरी एक लड़के के हाथ, पास के कबाड़ी के पास भिजवा दी और वह लड़का पच्चास का नोट दे गया था|ये रात भी जैसे तैसे बीत गई| अगली सुबह सारधा बी फुलवा को अपने साथ ले गई| रास्ते में सब्जी मॅंडी से दस भुट्टे , दो तीन निम्बू, और माचिस आदि लेकर दे दिए और फुलवा को काम भी समझा दिया|
फुलवा सारा सामान और बच्चे को साथ ले एक मंदिर के सामने आ कर बैठ गई| दो ईंटें जमा कर, उपर लोहे की जाली रख, कोयलों में आग लगाने का प्रयास करने लगी| फुग़ना मारे भूख के रोए जा रहा था वह बार बार अपना दूध पिलाने का प्रयास कर रही थी| परंतु लाख कोशिशों के बाद भी बच्चे को कुछ नहीं मिलता था| मानों अब तक उसका अपना दूध सूख गया हो| वह फिर भी उसे शांत करने के लिए अपने दूध पर डाल देती| कुछ नहीं मिला तो बच्चे ने अपने चारों दाँत गड़ा दिए और वह दर्द से कराह उठी| दर्द की टीस उसके मुख पर भी उभर आई| कटी हुई जगह को सहलाने लगती और कभी कभी देख भी लेती कि कहीं खून तो नहीं निकला| फिर सोचने लगती काश, खून ही निकल आता तो अच्छा था| कम से कम बच्चे के पेट में तो कुछ चला जाता, थोड़ी देर के लिए ही सही, शांत तो हो जाता|
दो घंटे बीत गये, कोई पूछने तक नहीं आया| कहते हैं न कि “कोशिश करने वालों की हार नहीं होती”| करीब दो बजे एक स्कूल के कुछ बच्चे आए और एक साथ पाँच भुट्टे बिक गये, दस रुपये का एक, उसके पच्चास रुपये अब उसके पास आ गये थे| चेहरे पर थोड़ा संतोष दिखने लगा था|
परंतु मुसीबत मानों इसी समय का इंतजार कर रही थी| तभी एक ट्रक नुमा गाड़ी दनदनाती हुई उसके सामने आकर रुकी| उस ट्रक से चार पाँच बदमाशनुमा लोग उतरे और उसके सामने चिल्ला चिल्ला कर कहने लगे,
” ला, सौ रुपये निकाल, ला, सौ रुपये निकाल|”
फुलवा हक्का, बक्का, उनके मुँह की ओर देखती रही| उसे समझ में नही आया कि कौन थे ये लोग |
दो लोग उसकी चटाई के नीचे रुपये तलाशने लगे, ” एक पच्चास का नोट है यहाँ तो” एक बोला|
दूसरा बोला, ” अरे इसे कहो अपने लाकर में से निकाल कर देगी बाकी पच्चास रुपये, औरतों के पास अपने अलग से लाकर होते हैं जहाँ वे अपना रुपया सुरक्षित रखती हैं ”
फुलवा केवल प्रश्न भारी निगाहों से उन्हें देखती भर रही|
“तुम्हें मालूम नहीं ये कमेटी की जगह है यहाँ मुफ़्त में कोई नहीं बैठ सकता| जो यहाँ बैठ कर बिजनेस करता है उसे रोज का सौ रुपया किराया देना पड़ता है| कल यहाँ बैठना हो तो पच्चास रुपये आज के और सौ रुपये कल के लेकर बैठना, समझ गई तुम ?” पच्चास का नोट अपनी जेबों में ठूंसते हुए ट्रक के धुँए का घना बादल सा छोड़ते हुए गाड़ी में बैठ, वे चारों चलते बने| जाते जाते बिजनेस के नियम भी समझा गये थे|
फुलवा ठगी सी उन्हें जाते हुए देखती रही| फुलवा के लिए ये सब किसी सदमें से कम न था| बहुत देर तक तो वह इसी सदमें में रही| आख़िर हिम्मत जुटा बाकी बचे पाँच भुट्टों को सहज कर फिर से तैयारी करने लगी|
कहते हैं “अवसर कभी जोड़ों में नहीं मिलते और मुसीबत कभी अकेली नहीं आती|” ठीक यही फुलवा के साथ भी हुआ|
अभी आधा घंटा भी नहीं बीता था ये हादसा हुए तभी एक पुलिस वाले का मोटर साइकिल उसके सामने आकर रुका| वह सोच ही रही थी पच्चास रुपये लूट कर ले जाने वाले गुण्डों की शिकायत इस पुलिस वाले से करे कि न करे, पुलिस वाले ने आगे बढ़ कर भुट्टे समैत जाली, वाली, सब नाली में फैंक दिए और चटाई खींच कर सड़क के दूसरी ओर फैंक दी| “चल भाग यहाँ से,” एक भद्दी सी गाली देते हुए वहाँ से चले जाने का फरमान सुना दिया|
“यहाँ सरकारी ज़मीन पर कब्जा जमाने वालों को उठा कर जेल में बंद कर दिया जाता है, ये तो छोटा बच्चा है तेरे साथ, नहीं तो अब तक तूँ सलाखों के पीछे होती| भाग जा यहाँ से, आज तो यहाँ प्रधानमंत्री का सफाई अभियान चलाया जा रहा है, अभी यहाँ बड़े बड़े नेता झाड़ू लेकर आते होंगे| आस पास भी दिखलाई दी तो उठा कर जेल में डाल दूँगा|”
फुलवा का दिमाग़ सुन्न पड़ गया था| उसकी समझ में कुछ नहीं आया| यदि बड़े बड़े नेता यहाँ झाड़ू लगाएँगे तो हमारे जैसों को यहाँ काम कैसे मिल सकता है, वह सोच में पड़ गई| उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था, अब करे भी तो क्या? किसे दोष दे ? भगवान को, संमाज को या अपने नसीब को| अपने लिए तो वह कुछ भी सोच सकती थी परंतु अब तो एक मासूम की ज़िम्मेवारी भी उस पर थी| दिल पर पत्थर रख कर फिर से कल की उम्मीद में अपनी झुग्गी की ओर चल दी| सामने से सारधा बी दिखलाई पड़ गई , अब तक रुके हुए आँसुओं के सैलाब को रोक नहीं पाई और उसे देखते ही फफक कर रोने लगी| वहाँ उसका कोई अपना था भी तो नहीं जिसके साथ वह अपना दुख बाँट सके| सारधा बी ने भी हाथ थाम कर उसे गले से लगा लिया| फुलवा की व्यथा सुन कर सारधा बी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ|
“ये शहर है फुलवा, यहाँ न तो संवेदना में कोई तपिश है और न ही रिश्तों में कोई गर्माहट, लोग जीते तो हैं यहाँ, बस, बुझे हुए कोयलों की तरह” सारधा बी उसे दिलासा देने लगी|
यह कहानी पूर्णतया काल्पनिक है| पात्रों अथवा घटनाओं का किसी से मेल खा जाना महज एक इत्तफाक होगा|सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं| © लेखक {भगवान दास मेहन्दीरत्ता, गुड़गाँव}



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