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क्या आवश्यक था, जले पे नमक लगाना?

Posted On: 9 May, 2015 Others में

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क्या आवश्यक था, जले पे नमक लगाना?
देश भले ही भूल जाए, 28 सितंबर 2002 की उस काली रात को, नुरूल्ला शेख का परिवार भूल पाएगा, न अब्दुल्ला शेख स्वयं| किसी ने अपना पिता, अपना पुत्र, अपना भाई, अपना शोहर खोया तो किसी ने अपने हाथ पाँव| दिन भर की थकि हारी जिंदगी, फुटपाथ को अपना आशियाना बनाकर दो घड़ी आराम करने को लेटी ही थी कि एक अमीरज़ादे की बड़ी सी कार ट्रेफिक के नियमों की धज्जियाँ उड़ाती हुई नूरूल्ल शेख, अब्दुल शेख, मुस्लिम शेख, मुन्नु ख़ान, और मुहमद कॅलीम को रौन्दति हुई चली जाती है| एक वहीं दम तोड़ देता है और चार अपाहिज| पीड़ित समझ लेते हैं कि उनका दुर्भाग्य है, दोषी समझता है कि उसके लिए आदमी मारना किसी कुत्ते को मारने के समान है, करोड़ों कुत्तों में से दो चार कम हो भी गये तो क्या? मगर सरकार के पेट में दर्द है! सरकार समझती है अपराध हुआ है| अपराधी को सज़ा मिलनी ही चाहिए|
व्यवस्था को 13 वर्ष लग जाते हैं सबूत समेटते-समेटते| लोग कहते हैं घोंघा बहुत सुस्त चाल चलता है|13 वर्षों में घोंघा भी यक़ीनन काश्मीर से कन्या कुमारी तक की यात्रा तय कर लेगा परंतु क़ानून को बांद्रा से मुंबई तक आते आते लगभग 4747 दिन गुजर जाते हैं| आख़िरकार एक न्यायाधीश अदम्य साहस का परीचय देते हुए दोषी को न केवल ढूँढ निकलता है बल्कि 5 वर्ष क़ैद-ए-बामशक्कत की सज़ा भी सुना देता है| कोई समझता है अंतत: न्याय हुआ, कोई समझता है अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे|
तभी एक चमत्कार होता है| प्रशासन में बला की सफूर्ति भर जाती है| घंटों का काम सेकिंड में होने लगता है| लगभग 4747 दिनों में एकत्र किए गये तथ्यों व उनके आधार पर दिए गये निर्णय को नकारने में कुल 1 घंटा 30 मिनट (गौर से देखा जाए तो 5-37 से 5-41 कुल चार मिनट) का समय लगता है|
छाती ठोक कर इस बात का प्रचार किया जाता है कि 8 मई 2015 के
सांयकाल 4-51 पर हाई कोर्ट से आर्डर की कापी मिलने का इंतजार|
सांयकाल 5-06 पर बांड पेपर हस्ताक्षर किए जा रहे थे|
सांयकाल 5-16 पर पेपर सेशन कोर्ट के अंदर थे|
सांयकाल 5-34 पर आरोपी का कोर्ट में आगमन होता है|
सांयकाल 5-37 पर आरोपी आत्म समर्पण करता है|
सांयकाल 5-41 पर आरोपी मुंबई छोड़ देता है|
गज़ब की चपलता का उदाहरण पेश किया है इस बार देश की न्याय व्यवस्था नें| जी चाहता है उन हाथों को अपनी आँखों से छुआ कर चूम लूँ| थोड़ी चरण धूलि गर जो मिल जाए तो जन्म सफल हो जाए| अत्यंत ही आश्चर्य जनक घटना घटी है, फिल्मी भाषा में कहूँ तो, “फिनोमिनल” वरना अपना अनुभव तो ये कहता है कि अपने राम को तो एक साइकिल चोरी होने की रपट दर्ज करवाने में ही हफ्तों लग जाते| बलिहारी जाऊं भगवन| ऐसी प्रथमता, पूर्वगमता स्थापित करने वालों को शत शत नमन| यही परंपरा अगर हमेशा के लिए कायम हो जाए तो देश चरण धो धो कर पिया करे मान्यवर, आपके|
न्याय व्यवस्था की इस बदली हुई तस्वीर को देखकर देश स्तब्ध है| कोई मानने को तैयार ही नहीं कि 13 वर्ष पूर्व घटी घटना कोई वास्तविक घटना थी| लोग तो शर्त लगाने को तैयार हैं कि ये घटना किसी फिल्म की शूटिंग का हिस्सा रही होगी, अगर सचमुच कोई मौत हुई होती तो, कोई न कोई अपराधी तो होता| भला अपराधी को भी कभी यूँ खुला छोड़ा जाता है क्या? वह जज भी शक के घेरे में है जिसने सलमान ख़ान जैसे नामी गिरामी हस्ती को दोषी करार दिया है|
कोई वक्त था, शिक्षक, चिकित्सक एवं न्यायविद को देव तुल्य माना जाता था| कहीं कोई शक की गुंजाइश ही नहीं होती थी| गुरु और गोबिंद में कौन श्रेष्ठ है, गोस्वामी तुलसी दास जी को भी दुविधा में से गुज़रना पड़ा था| अंतत: उन्हें गुरु में ही श्रेष्ठता दिखलाई दी थी| डाक्टर पृथ्वी के भगवान होते हैं ऐसा सभी बुजुर्ग कहते आए हैं|
माना कि आज गुरु अपने स्तर से गिरता जा रहा है, गोबिंद तो क्या, कहीं कहीं तो मानव तुल्य भी नहीं रहा|
माना कि भगवान ने अब धरती पर डाक्टर रूप में अवतार लेना बंद कर दिया है|
माना कि अब पॅंच में परमेश्वर देखने के दिन लद गये हैं|
माना अनेकों न्याय विदों ने देश की लचर न्याय व्यवस्था पर अनेकों बार क्षोभ व्यक्त किया है|
माना अनेकों न्यायधीशों ने माना कि निर्णय देते वक्त उनके दिलो दिमाग़ कुछ और कहते रहे और कलम कुछ और लिखती रही|
माना कि देश की न्याय व्यवस्था आज अमीरज़ादों के हरम की लौंडी हो गई है|
माना कि आज संपन्नता ने विपन्नता के घुटने तोड़ के रख छोड़े हैं|
माना कि देश के ग़रीब, बेघर इंसान, कुत्तों से भी बदतर जिंदगी बिताने पर मजबूर हैं|
परन्तु सलमान जी……
क्या ज़रूरी है, सड़कों के किनारे सोए हुए बेज़ुबान, बेकसूर कुत्तों (आपके अत्यधिक प्रिय फ़ैन अभिजीत के अनुसार) को यूँ ही कुचलते हुए चलना?
क्या ज़रूरी था तथाकथित कुत्तों की मौत का यूँ जश्न मानना?
क्या ज़रूरी था यूँ लड्डू बंटवाना?
किसी के ज़ख़्मों पर यूँ नमक लगाना,
क्या ज़रूरी था?

भगवान दास मेहंदीरत्ता
गुड़गाँव
9-05- 2015
Email: b.dass1@gmail.com



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