मेरा देश मेरी बात !

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बहुत शोर सुनते थे पहलु में दिल का, मगर जब चीरा तो कतरा-ए-खूं निकला

Posted On: 21 Dec, 2015 Others में

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अंतरराष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियों पे तो देश को नाज़ होगा, देशवासियों की तो छोटी छोटी इच्छाएँ हैं माननीय प्रधानमंत्री जी
इस आम चुनाव में भ्रष्टाचार ही एक ऐसा मुद्दा था जिसके तिलिस्म ने भारत के नागरिकों को एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी का मुरीद बना दिया था| बहुत कुछ हुआ लेकिन ज़मीन पर कुछ भी न हुआ जिसका जनता को आज भी इंतज़ार है|
पंजाबी में एक कहावत है: साँप को साँप लड़े, तो जहर किसे चढ़े?
आज एक ही पार्टी के दो नेताओं में आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला चल निकला है|
अनेकों प्रकार होंगे परंतु मेरे विचार में मुख्य तीन प्रकार के भ्रष्टाचार व्याप्त हैं मेरे देश में :
1. अपने अधिकार पाने एवं वैधानिक कार्य करवाने (जैसे कि अपना पता बदलवाना) हेतु कर्मचारियों की मुट्ठी गरम करना अनिवार्य होना|
2. दंड से बचने अथवा अवैधानिक कार्यों को निर्विघ्न पूर्ण करवाने हेतु दिया जाने वाला शुल्क|
3. सरकारी खजाने में (अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता की जेब में) सेंध लगाना|
ये कोई पहली बार नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता आरोपों के घेरे में आया है| ये तो हवा थी कि प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की बात कुछ हट के है| कीर्ति आज़ाद जी ने कुछ गढ़े मुर्दे उखाड़ने का प्रयास अवश्य किया है ये उनके संबंधित विभाग की बात थी वरना तो देश के प्रत्येक विभाग के प्रत्येक कर्मचारी के हृदय में ऐसे अनेकों मुर्दे दफ़्न हैं| मगर सत्येंद्र दूबे और मंजुनाथ के अंजाम तक पंहुचने का मादा किसी किसी में है|
2014 के आम चुनाव से पहले एक सफुर्लिंग फूटा एक चिंगारी निकली पहले अन्ना हज़ारे फिर केजरीवाल और चुनाव आते आते नरेंद्र मोदी के रूप में भारतवासियों को मसीहा नज़र आने लगे| राम राज की संकल्पना फ़िज़ा में चहूँ ओर फैल गई| भ्रष्टाचारमुक्त भारत के सपने देखे जाने लगे| मगर आमजन जिस बदलाव की उम्मीद लगा बैठा था ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| आम आदमी को उम्मीद थी कि अब से जब भी विकास प्राधिकरण, तहसील थाना, बैंक, आयकर विभाग, अस्पताल, परिवहन विभाग, रेल विभाग अथवा राशन के दफ़्तर आदि में उसका जाना होगा तो विभागीय कर्मचारी पलक पावडे बिछाय बैठे मिलेंगे| आपका जो भी काम होगा हफ्तों में न सही महीनों में तो हो ही जाएगा| परंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आज भी आपकी अर्जी पर सालों सुनवाई नहीं होती आप चाहे ऊपर और ऊपऱ तक जा कर देख लें| आम आदमी की फाईल टस से मस नहीं होती| हर तीसरे आदमी के पास सालों पुरानी अपनी समस्या और दर्जनों अर्जियाँ देने की दास्तान होगी| बहुत से ऐसे होंगें जिन्हें थक हार कर बिचौलियों या यूँ कहिए, दलालों की शरण में जाना ही पड़ा होगा| अनेकों ऐसे भी होंगे जिन्होने सालों इंतजार कर के बाद में दलालों के पास जाने से पहले जाना सही समझा होगा| नहीं होंगे तो बस सबूत नहीं होंगे उनके पास| क्योंकि इस देश में तो रोग को नहीं रोगी को मार देने की परंपरा रही है| योग्यता होते हुए भी नेताओं को पैसा दे कर पुलिस मे भर्ती होने का या सरकारी शिक्षा विभाग में अध्यापक लगने का चलन था, तो पैसा देकर ही भर्ती होना था न, फिर उन लोगों की नौकरियाँ दाँव पर क्यों? जब जब भी किसी ने मंजुनाथ अथवा सत्येंद्र दूबे बनने का प्रयास किया है उसे जान से ही हाथ धोना पड़ा है| अपने आसपास के उच्चाधिकारियों से तंग आकर जब भी किसी साहसी व ईमानदार कर्मचारी ने विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार को प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुँचाने का साहस जुटाया है प्रधानमंत्री कार्यालय ने इतनी कार्यवाही दिखलाई है कि एक नये पत्र में लपेट कर उसी शिकयती पत्र को उन्हीं भ्रष्ट अधिकारियों के पास जाँच के लिए भेज दिया है इसका परिणाम यही हुआ है कि उन्हें ईमानदार कर्मचारी को जड़ से मिटाने का अवसर दे दिया गया है| अपने स्तर पर ईमानदारी से कार्यवाही करने का प्रयास नहीं किया गया| और जो सबूत जुटाए बगैर कुछ बोला उसकी आवाज़ तो कहीं नहीं पहुँचती| बहुत पुरानी बात है “The Times Of India” में खबर थी कि एक दंपत्ति ने सबूत जुटाने का साहस भी किया था परंतु उन्हें सरकारी दस्तावेज़ों की कापियाँ रखने के इल्ज़ाम में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था| पूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी ने आम जनता को भ्रष्टाचार से मुक्त होने का सूत्र सुझाया था कि “आप किसी को रिश्वत दो ही न”| सही है, परंतु मान्यवर, यह सूत्र केवल अन्ना हज़ारे जी जैसे नागरिक ही अपना सकते हैं| एक आम आदमी जो किराए के मकान में रहता है और जोड़ जुगाड़ कर के किसी शहरी विकास प्राधिकरण में घर बना लिया है वह अपने घर में प्रवेश पाने के लिए अधिकारियों के प्रमाण पत्र मिलने का कब तक इंतज़ार करेगा? आख़िर कितने वर्ष तक| किराया और बैंक ब्याज दोनो का मीटर तो द्रुत गति से दौड़ रहे होते हैं| अधिकारियों के कान पर वर्षों जूँ नहीं रेंगति| पीढ़ियाँ बदल जाएँगी परंतु स्थिति नहीं बदलेगी|
दूसरे प्रकार के भ्रष्टाचार में तो सेवा प्रदाता और उपभोक्ता दोनो के परस्पर निहित स्वार्थ होते हैं ये शायद सरकारी तंत्र का सर दर्द होना चाहिए परंतु ये दर्द अधिक पीड़ादाई नहीं होता न सरकार के लिए न आमजन के लिए, क्योंकि इसमें कम से कम एक तरफ तो सरकारी आदमी ही होता है|
अब आते हैं भ्रष्टाचार की तीसरी श्रेणी की ओर| कीर्ति आज़ाद जी, देश के अन्य विभागों के ईमानदार कर्मचारियों के योगक्षेम की सुरक्षा का भरोसा दिला कर पूछना शुरू कीजिए, आज भी अस्पतालों में near expiry की दवाइयाँ खरीद कर उन्हें जल्द से जल्द निपटाने की होड़ लगी होगी| आज भी दफ़्तरों के अच्छे भले फर्नीचर को बदल कर चाइना मेड फर्नीचर भरा जा रहा होगा जिसकी मयाद आपूर्ति करता के बिल पास होने तक होगी| आज भी ऐसी अनेकों मशीने मँगवाई जा रही होंगी जिनका उत्पादकता अथवा आमजन की सेवा से कोई लेना देना नहीं होगा| आज भी सड़कें बनाने के नाम पर उपरी स्तह को काला कर के छोड़ दिया जा रहा होगा| आज भी घूस दिए बगैर संपत्तियों का हस्तांतरण संभव नहीं होगा | आज भी बिना सुविधा शुल्क दिए मकानों के नक्शे पास करवाना शायद असंभव सा होगा| आज भी राशन की बोरियों का वजन बढ़ाने के लिए बोरियों पर पानी छिड़का जा रहा होगा| आज भी किसानों की अथक मेहनत से उगाया गया अनाज गोदामों के अभाव में खुले में सड़ रहा होगा| आज भी मनरेगा जैसे प्रावधान सरकारी बाबुओं के बैंक बैलेंस बढ़ा रहे होंगे| आज भी मिड डे मील के नाम पर छिपकलियाँ अथवा चूहों की विष्ठा परोसी जा रही होगी| आज भी फ़ौजी भाइयों के राशन में सेंध लग रही होगी| आज भी सुरक्षा उपकरणों व शहीदों के लिए कोफिन की खरीद में दलाली का चलन व्याप्त होगा| जितना विशाल देश उतनी विशाल देश की गौरव गाथा|
तो कीर्ति आज़ाद जी आप ने नया कुछ नहीं किया| इस सब से तो वाकिफ़ है देश| आप तो सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता हैं, करना ही चाहते हैं तो कुछ ऐसा कीजीए की देश की जनता कुछ सुख की साँस ले सके| जैसे क़ानून को सख्ती से लागू करवाईए कि किसी काम, जैसे कि पता बदलवाने, की समय सीमा तय कर दी जाय और समय पर उचित कार्यवाही न होने पर संबंधित अधिकारियों पर प्रशासनिक कार्यवाही होने का प्रावधान हो|
दूसरे, प्रमाण इकट्ठे करना शिकायत करता की ज़िम्मेदारी न हो, सरकार अपने स्तर पर प्रमाण एकत्र करे हाँ, झूठी शिकायत करता पर भी दंड का प्रावधान हो| देश आपका अभारी होगा| अंत में बस इतना कहना चाहूँगा|
ए चारासाज़ कोशिश-ए-मरहम फ़िजूल है|
वाकिफ़ हैं अपने जख्म की गहराइयों से हम||
भगवान दास मेहंदीरत्ता
गुड़गाँव



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