मेरा देश मेरी बात !

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मैं बोल रहा हूँ, नरेंद्र दामोदर मोदी

Posted On: 9 Jan, 2016 Others में

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लोग कहते हैं नवाज़ ने पीठ में छुरा घोंपा है|
तुम अपनी आदत से मजबूर हो,
हमारी फ़ितरत कुछ और है|
सच ही कहा है, संत कबीर ने,
जां को जो है सुभाव जाए न जीव सों|
नीम न मीठी होए सींचो गुड़ घीव सों||
पाक तुम्हारी हरकतें थीं तो पहले ही न क़ाबिले बर्दाश्त, पठानकोट के घाव ने पिछले सभी ज़ख़्म फिर से हरे कर दिए हैं| मुंबई, दिल्ली, सूरत, गुरदासपुर, सीना छलनी कर दिया है तेरी करतूतों ने|इधर जब कभी भी तुम्हारा कोई कुत्ता या बिल्ली ज़रा सी खरोंच क्या लगा देते हैं विपक्ष बौखला कर स्वाल करने लगता है “अब कहाँ गया वो छप्पन इंच का सीना?, रो देती है ये आँख और हृदय भी दर्द से कराह उठता है, जब जब मेरा अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त होता है और तब भी जब जब मेरा लक्ष्मण मूर्छित होता है | सोचता हूँ सीना अगर चौड़ा हो तो बुद्दी का इस्तेमाल क्या न किया जाए?
माँ कहती हैं बेटा नरेंद्र, यदि तुम्हारा दामन कभी काँटे दार झाड़ियों में उलझ जाए तो धैर्ये से रुक कर दामन छुड़ाने का प्रयास करना, खींचा तानी में अपना दामन भी चाक हो सकता है| विपक्षी प्रवक्ता ये स्वाल भी करते हैं कि म्यांमार और पाकिस्तान में भेद क्यों? तो क्या देश को युद्द की विभीषिका में झोंक दिया जाए?
लेकिन आदिकाल से ही भारतवर्ष की यही सोच रही है कि यथासंभव युद्द से बचा जाए| जानते तो वे भी थे कि ठग, कुटिल कामी, क्रोधी लोभी के सामने न्याय, नीति और नैतिकता की बात करना बंजर भूमि में बीज डालने के समान होता है परन्तु फिर भी श्री राम जी ने रावण को भी युद्द से बचने के लिए अनेकों अवसर दिए थे| समुद्र जैसे जड़ पदार्थ के सामने भी उन्होने तो अनुनय विनय का विकल्प ही चुना था कि सागर को तो मैं सुखा दूँ पर उन निर्दोष जीवों का क्या होगा जो इस में रहते हैं | तीन दिन की प्रतीक्षा के पश्चात जब प्रेम की भाषा नहीं समझी गई तब उन्होने ये कहते हुए बल प्रयोग का निर्णय लिया था|
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“शठ सन विनय कुटिल सन प्रीति| सहज कृपन सन सुंदर नीति||
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“ममता रत सन ज्ञान कहानी | अति लोभी सन विरति बॅखानी||
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“क्रोधिहि सम कमिहि हरि कथा | ऊसर बीज बएँ फल जथा||
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द्वापुर युग में भी तो भगवान श्री कृष्णजी ने शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करने के पश्चात ही उसे मृत्यु दंड दिया था | महाभारत युद्दको टालने के भी अनेकों प्रयास किए गये थे | आग लगाने वाले चूहे तो अपने अपने बिलों में घुस कर तमाशा भी देखते हैं और पराई आग पर अपनी रोटियाँ भी सेकते हैं, जबकि निर्दोष, निरीह, निहत्थे लोग युद्द की भेंट चढ़ जाया करते हैं |
पाकिस्तान में अव्वल तो बुद्दीजीवी बचे ही नहीं या फिर उनमें राक्षसी ताकतों के सामने कहने का साहस ही नहीं कि अपनी युवा शक्ति को सकारात्मक उत्पादकता में लगाओ न कि तमाशा देखने की ग़र्ज़ से यूँ आग में झोंकते जाओ |
चूहे को कहीं न कहीं ये गुमान हो गया है कि वह हिमालय को हिला देगा ! अंधकार, सूरज को बुझा देने के सपने देखने लगा है| भारत की उन्नति और विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा को देख तिलमिलाया हुआ है पाकिस्तान|
न जाने प्रकृति ने मध्य एशिया के कुछ हिस्सों की तासीर कैसी बनाई है कि अधिकतर राक्षसी प्रवृतियाँ इसी इलाक़े में जन्म ले रहीं हैं | न स्वयं चैन से रहते हैं न विश्व को रहने देते हैं और एक एक कर के अपना सर्वनाश करते जा रहे हैं| सद्दाम हुसैन, ओसामा बिन, बग्दादि, हाफ़िज़ और मसूद जैसे शैतानी फ़ितरत के लोग इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, ईरान, तुर्की को बर्बाद कर चुके हैं | खुश न हों पाकिस्तानी हुक्मरान, पाकिस्तान के सर्वनाश की भी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है| कुछ सपोलिए छछूंदर निगल तो गये हैं अब अपनी जान गवाँ कर ही मानेंगे|
इल्ज़ाम ये भी है कि बिरियानी खाने का लालच मोदी को पाकिस्तान ले गया | मोदी का क्या, व्यक्तिगत लाभ हो सकता है? मोदी ने तो देश के भीतर भी विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस के सामने भी चाय की चर्चा के दौरान देश हित में GST बिल पर स्वीकृति की मुहर लगाने की अनुनय विनय की थी परंतु कांग्रेस के कुछ निजी स्वार्थों के रहते उनके कानों पर जूं नहीं रेंगी तो कर क्या सकता है कोई? देश पर तो भीतर और बाहर दोनों ओर से दबाव है|
पड़ोस का तो एक ही मकसद है, हम तो डूबेंगे, तुम्हें भी ले डूबेंगे| लेकिन हमें तो प्रत्येक घर में चूल्हा जलवाना है| प्रत्येक युवा हाथ को रोज़गार दिलवाना है| देश के गाँव, शहरों को राजमार्गों, वायूमार्गों से जोड़ना है| जल, शिक्षा व उत्तम स्वास्थय की व्यवस्था करनी है| ऊर्जा की आपूर्ति व संरक्षण करना है| अपनी युवा शक्ति को तकनीकी तौर पर इतना सक्षम करना है कि कोई बाहरी ताक़त यदि आँख उठा कर देखे तो आँखे नोच ली जाँये और आवश्यकता यदि पड़े तो न केवल खुद पर आई प्राकृतिक आपदाओं से लड़ सकें, दूसरों की सहायता करने में भी हम सक्षम हों| अपने हिस्से के धरती, आकाश व समुद्र की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है| भीतर बाहर पनप रहे आतंकवाद से निपटना है| मित्रता का हाथ बढ़े तो गले से लगाएँगे हम, किसी भी तरह की दुश्मनी का मुँह तोड़ जवाब देने को हर ओर से तैयार हैं हम| फिर भी आधुनिकरण के इस युग में अनेकों तरह की ज़मीन तैयार करनी होगी| पश्चिम की आवश्यकता पड़े शायद| जानते तो हैं पाश्चात्य देश भी कि पाकिस्तान भी इराक़, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान के जैसे शैतानी ताकतों से प्रभावित देश है और आतंकवाद की नर्सरी है परंतु जब तक उनका निजि स्वार्थ नहीं होगा वे खुल कर सामने आने वाले नहीं| उन्हें भी विश्वास में लेने की आवश्यकता होगी| थोंपा गया युद्द अगर तो, सोचता हूँ इस बार हो तो निर्णायक युद्द हो| पहले की भाँति साँप को घायल कर के फिर से डसने को छोड़ न दिया जाए| अबकी बार नाग के फॅन को अच्छी तरह से कुचल दिया जाए|
आशा करता हूँ आवश्यकता यदि पड़े तो धन से भरे देश के धार्मिक स्थलों के तहख़ाने और विदेशी बैंकों में रखे देश के ख़ज़ाने देश हित मेँ अपने मुँह खोल देंगे|

[आलेख व प्रस्तुति भगवान दास मेहंदीरत्ता]
[गुड़गाँव]



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