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नक्सलवाद बनाम सशस्त्रबल

Posted On: 28 Jan, 2016 Others में

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नक्सलवाद व माओवाद आदि समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए सरकार ने 17 नई बटालियन भर्ती करने की घोषणा कर दी है, मानो लहु को लहु से धोने की एक और कोशिश| अँग्रेज़ी सरकार की तरह ये प्रजातांत्रिक सरकारें भी प्रजा से अधिक अपने प्रशासनिक अधिकारियों व अपनी पुलिस आदि सशस्त्र बलों पर विश्वास करती हैं| लेकिन सरकारों को इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए कि सभी अधिकारीगण विश्वास योग्य नहीं होते| अनेकों अधिकारी अपनी महत्वाकांक्षाओं के रहते दंभपूर्ण व तानाशाही रवैया अपनाते हैं और या तो सीधे तौर पर आम जन के ज़र, जोरू, ज़मीन पर हमला करते हैं या ऐसे कुकृत्यों में लिप्त अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही न करके पीड़ितों के क्षोभ की आग को बढ़ाने में घी का काम करते हैं|
आम आदमी यूँ ही नक्सलवादी नहीं बन जाता| उसे तो अपनी दैनदिनी समस्याओं से दो दो हाथ होने से ही फ़ुर्सत नहीं होती| अधिकतर समय तो दो जून रोटी जुटाने में ही लग जाता है| वे लोग हथियार कहाँ से लाएँगे? परंतु जब जब उसकी ज़र, जोरू, या ज़मीन पर हमला होता है, जब प्रश्न अस्तित्व को बचाने का होता है तो उसके सामने करो या मरो की स्तिथि आन खड़ी होती है| प्रकृति और प्रशासन दोनो ओर से हमले होते रहते हैं| प्रकृति के प्रकोप को तो वे अपनी नियती समझ कर सहन कर भी लेता हैं परंतु मानवीय अन्याय व क्रूरता उसके लिए असहनीय हो जाते हैं| प्रभावित समाज कुंठा में जीने लगता है| कुछ स्वार्थी लोगों के कारण देश और संमाज दोनो का नुकसान होता रहता है| देश की उत्पादकता प्रभावित होती है| दर्द जब हद से गुज़र जाता है तो उनमेँसे कुछ लोग आत्मघात की राह चुनते हैं तो कुछ इसे अस्तित्व की लड़ाई मान कर हथियार उठा लेते हैं|
नक्सलवाद पर नकेल कसने के अनेकों प्रयास सरकार और प्रशासन द्वारा किए जाते हैं|कभी उपद्रवी ढेर कर दिए जाते हैं तो कभी देश के जाँबाज़ जवान, अशांति और असंतोष की बलि चढ़ जाते हैं| नुकसान दोनो ओर से देश का ही तो होता है! अनेकों बार बाग़ियों को हथियार डाल कर समाज की मुख्य धारा में मिल जाने को प्रेरित भी कर लिया जाता है परंतु उनकी समस्याओं का क्या? हो सकता है सुना जाता हो| निवारण के आश्वासन भी दिए जाते हों| परंतु समाधान के वक्त अनेकों दाँव पेच, अनेकों अधिकारियों की महत्वाकांक्षाएँ! समर्पण करता स्वयं को ठगा सा महसूस करने लगता है|जिन लोगों ने उन्हें हथियार उठाने को विवश किया था उन्हें तो वे पहले से भी ज़्यादा फलते फूलते देखता है| ज़िम्मेदार लोगों की पहचान कर के व उन्हें दंडित कर के पीड़ितों के ज़ख़्मों पर लेशमात्र भी मरहम लगाने का प्रयास नहीं क्या जाता| यदि कोई विद्रोही हथियार डाल, मुख्य धारा में मिलने का मन बना भी ले तो क्या? बदले में उसे क्षतिपूर्ति का भी हक नहीं| उसके अपराधों की सज़ा तो उसे मिले परंतु उसकी इस दशा का ज़िम्मेदार व्यक्ति ऐश्वर्यपूर्ण व सम्मानित जीवन जिए ये तो संविधान की भी प्रस्तावना की अवहेलना व अपमान होगा|
[आलेख व प्रस्तुति: भगवान दास मेहंदीरत्ता गुड़गाँव]



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