मेरा देश मेरी बात !

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अपनी राष्ट्रीयता मैं हिन्दुस्तानी लिखुं कि विवादिस्तानी?

Posted On: 30 Jan, 2016 Others में

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कुछ अरसा हुआ मेरे देश में लगातार विवादों की बम वर्षा हो रही है| छोटी छोटी बातों को ले कर विवादों के बखेड़े खड़े किए जा रहे हैं| प्रधानमंत्री जी ने आधी बाँह का कुर्ता छोड़ सूट पहन लिया, लो हो गया बखेड़ा | वे यदि बिना बताए पाकिस्तान निकल गये हो गया विवाद ! कोई गढ़े में गिर गया विवाद, किसी ने माँस पका कर खा लिया विवाद| मंदिर पर विवाद, मस्जिद पर विवाद| आरक्षण पर विवाद, हत्या पर विवाद, आत्महत्या पर विवाद| हत्यारों की फाँसी पर विवाद, हत्यारों सज़ा माफी पर विवाद ! नये नये विवादों को जन्म देना और फिर उन विवादों को हमेशा हरा रखने में मीडिया का अहम हाथ है| कोई भी भगवाधारी एक शगूफा छोड़ देगा राम मंदिर बनना चाहिए तुरंत मीडिया वाले मुसलमानों के पास पहुँच जाएँगे हिंदू तो मंदिर बना रहे हैं तुम्हारी प्रतिक्रिया क्या है? मीडियाकर्मी के मनवांछित प्रतिक्रिया मिली तो ठीक, नहीं तो जाएगा किसी दूसरे के पास, फिर तीसरे के पास| कोई न कोई तो तल्खी भरा तीर छोड़ ही देगा| फिर क्या, मीडियाकर्मी की तो बाँछें खिल जाएँगी| परिणाम पर विचार किए बगैर दिन भर क्या, कई दिनों तक उसी ब्यान को छीलता ही जाएगा लहू लुहान होने तक | भाड़ में जाए देश और देशवासी उसे तो अपनी दुकान में नये से नया चटपटा मसालेदार माल रखना है दुनिया चटकारे ले और उनकी आमदनी बढ़ती जाए| मुद्दों पर on screen चर्चा में भाग लेने वाले बुद्दीजीवियों को न जाने क्या हो गया है कभी कभी तो उनके व्यवहार से देश के आम नागरिक को शर्मसार होना पड़ता है | पर्दे पर ही कुत्ते बिल्लियों की तरह झगड़ने लगते हैं विचारे बिना, कि देश ही नहीं विश्व का अधिकांश भाग उन्हे देख रहा होगा | मीडिया वाले भी आनन्द ले रहे होते हैं ठीक उस मदारी की तरह जो हर गली नुक्कड़ पर साँप और नेवले की लड़ाई दिखला कर अधिक से अधिक धन कमाना चाहता है |
हिंदू भाई नहीं चाहते कि हिंदू बाहुल्य वाले देश में माँस भक्षण के लिए उनके पूजनीय पशु गाय की निर्मम हत्या की जाए| लेकिन ऐसा तो यहाँ आज़ादी से पहले से ही रहा है यकायक इस मुद्दे को लेकर धार्मिक उन्माद फैलाने से भी क्या हासिल| मुसलमान ही क्यों ईसाई भी गोमांस भक्षण करते हैं उन सभी से बैठ कर बात चीत की जा सकती है और उन्हें विकल्प अपनाने पर राज़ी किया जा सकता है|वैसे भी विश्व की 700 करोड़ आबादी में से कम से कम 400 करोड़ लोग गोमांस खाते होंगे उन पर नियंत्रण कैसे किया जाए|जमाना विश्व एकीकरण का है स्वयं नहीं खाते फिर भी गोमांस खाने वालों से नाता भी तोड़ा नहीं जा सकता|और उन हिंदुओं का क्या जो दूध तो दूह लेते हैं और छोड़ देते हैं गाय को पॉलिथीन खाने के लिए कितनी गाय बेचारी पेट के अफारे का शिकार हो रही हैं| और उन हिंदुओं का भी क्या जो माँस तो नहीं खाते मगर चंद रुपयों के लालच में पार्क में बैठी गाय को आटा खिलाने के बहाने आटे में सल्फास की गोली मिला कर खिला जाते हैं और शाम को मरा जानवर हटाने का दिखावा करते हुए हाथगाड़ी खींच कर ला रहे होते हैं| लालच और अहं दो ही बातों का चौतरफ़ा पसारा है| वरना ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान मिल बैठ कर न किया जा सकता हो|
“अयोध्या में राम मंदिर”, इसी मुद्दे को ही ले लीजिए | टी.वी. वाले इस मुद्दे को उछालने का कोई मौका नहीं चूकते| जहाँ तक आम आदमी का प्रश्‍न है देश की 70 से 80 प्रतिशत जनसंख्या ऐसी है जो अपने जीते जी अयोध्या जाने तक के साधन नहीं जुटा पाएगी| मंदिर बने कि मस्जिद शायद उन्हें कोई सरोकार नहीं होगा | हम हिंदू राम भक्त होने का दावा करते हैं तो रामजी के आदर्शों का अपने जीवन में पालन भी तो करना चाहिए| जिस त्याग की भावना का परीचय राम जी ने भरत के प्रति दिखलाया क्यों नहीं हम अपना दावा छोड़ सकते ? और, परिकल्पना यदि राम राज्य की, की जा रही हो तो मुस्लिम भाइयों से भी भरत के से व्यवहार की अपेक्षा की जा सकती है कि हिंदू भाइयों की आस्था व श्रद्दा का प्रश्न यदि है, तो वे भी त्याग का परिचय देते हुए विवादित स्थल को छोड़ देने पर विचार करें और एक नये स्थान पर एक विशाल और भव्य मस्जिद का निर्माण करें | हिंदू भाइयों को भी इस कार्य में दिल खोल कर सहयोग देना चाहिए|
परंतु लगता है कि प्रश्न आस्था, श्रद्दा अथवा इबादत का नहीं केवल और केवल अहं की लड़ाई है | एक दूसरे को नीचा दिखलाने की होड़ लगी है | वरना ईश्वर ने कब कहा है कि वे केवल मंदिर या मस्जिद ही में मिलेंगे बस और कहीं नहीं| जब तक अहंकार का टकराव होता रहेगा तब तक कुछ महत्वाकांक्षी ताकतें धर्म के नाम पर भोली भाली जनता को दंगे फ़सादों में उलझा कर अपनी रोटियाँ सेकती रहेंगी| सरकार यदि दोनो समुदायों के बुद्दीजीवियों को आह्वान करे कि मिल बैठ कर इस समस्या का हल निकलना ही है तो क्या न हो सकेगा| हाँ एक बात ज़रूर है अगर समाधान हो गया तो दोनो ओर के महत्वाकांक्षी नेताओं के हाथ से वोट हथियाने का मुद्दा जाता रहेगा| आज श्रद्दा,पूजा,इबादत आस्था का विषय न हो कर प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है| हर व्यक्ति में दिखावा करने की होड़ लगी है क़ि उससे बड़ा कोई भक्त या श्रद्दालू नहीं | आज जैसे लोग गाड़ियाँ, कोठियाँ, बैंक बैलेंस होने की डींगें हांकते हैं उसी तरह से महँगे से महँगे बाबा, प्रचारक अथवा संत का चेला होने का दंभ भरते हैं |
सही कहा है किसी शायर ने कि ” ज़िक्र-ए-खुदा बहुत है, ख़ौफ़-ए-खुदा नहीं”
इधर शृंगना पुर में शनि धाम पर स्त्रियों की उपस्थिति को लेकर मीडिया द्वारा एक अनर्गल विवाद पैदा किया जा रहा है | कुछ दिन पहले मीडिया ने एक रिपोर्ट तैयार की कि अमुक अमुक मंदिरों में स्त्रियों का जाना वर्जित है| जहाँ चार सौ साल तक स्त्रियों को कोई ख़याल नहीं आया वहाँ रातों रात मीडिया को एक जवलन्त मुद्दा मिल गया| यदि बुद्दीजीवी वर्ग समझ से काम लेता, मंदिर में जाकर स्त्रियों के लिए भी तेलाभिषेक की अनुमति की प्रार्थना करता| अनुमति न मिलने पर प्रश्न उठाता, विरोध करता | दस लोगों के बीच बात आती, अवश्य शांतिपूर्ण हल निकल आता | आव देखा न ताव सस्ती लोकप्रियता पाने के लालच में एक समस्या उत्पन्न कर दी गई| दोनो ओर से अहंकार की स्तिथि पैदा हो गई, टकराव तो होना ही था| किसी विशेष मंदिर अथवा इबादतगाह में स्त्रियों को जाने की मनाही क्यों है, कारण तो शायद कोई नहीं जानता, निसंदेह ये कोई ईश्वरीय फरमान तो हो ही नहीं सकता| यदि ईश्वर को स्त्रियों से परहेज़ होता तो धार्मिक पुराणो में सती, सीता, राधा आदि नामों का ज़िक्र ही न होता |चार सौ सालों से जो नहीं हो रहा था अब होने लगे या न हो अहम की तुष्टि के अतिरिक्त और क्या विशेष है इसमें| वैसे मंदिर प्रशासन के तो दोनो हाथ में लडडू होने चाहिएं| जितने अधिक श्रद्दालू उतनी अधिक कमाई| कुछ भी हो इस तरह के टकराव को भक्ति तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता | गीता में ईश्वर ने यज्ञ यानी कर्म को भक्ति कहा है| कर्म जो परोपकार के हेतु किया जाए| कर्म जो किसी दीन दुखिया के दर्द पर ठंडे फाहे का काम करे, शुद्द भक्ति होगा|
लो इसी में से एक नये विवादित मुद्दे का जन्म हो गया| मीडिया का कहना है कि शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी ने कहा है शनि ईश्वर नहीं देव है |जी हाँ शनि ईश्वर नहीं देव ही हैं| जहाँ तक हिंदुओं का प्रश्न है श्रीमदभगवत गीता हिंदुओं का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है| गीता में स्वयं योगेश्वर श्री कृष्ण ने कहा है कि ईश्वर अथवा विधाता वे स्वयं केवल एक हैं| प्रकृति (धरती,आकाश,जल, अग्नि, वायु, मन, बुद्दी, अहंकार आदि ) उनकी अष्ट्धा शक्ति है | शनि,मंगल,बृहस्पति आदि ग्रह भी प्रकृति में ही आते हैं| जिस प्रकार धरती पर सरकार एक है और उसकी कार्यकारिणी व न्यायपालिका शक्तियाँ काम करती हैं उसी प्रकार प्रकृति ईश्वर की कार्यकारिणी व न्यायपालिका शक्तियों का निर्वाह करती है| ऐसा माना जाता है कि शनि देव के पास न्यायपालिका शक्तियाँ हैं एक न्यायधीश की तरह वे प्राणियों के अपराधों के विधि अनुसार दंड तय करते हैं| इसलिए लोग उन्हें क्रूर ग्रह भी मानते हैं और भय के कारण भी उन्हें पूजते हैं| लेकिन वास्तविकता की ओर बढ़ेंगे तो चर्चा लंबी होती जाएगी| वरुण अर्थात जल, सूर्य, वायु, धरती, अग्नि अर्थात प्रकृति मिल कर प्राणियों को विभिन्न तरह के अन्न,जल,रस,फल,फूल, औषधियाँ आदि प्रदान करवाने में निरंतर कार्यरत रहते हैं इसलिए देवता कहलाते हैं| वरुण देव, सूर्य देव के ताप से स्वयं का रूप बदल कर वाष्प रूप धारण करते हैं पवन देव उन्हें ले जाकर उँचे से उँचे स्थानों पर स्थापित कर देते हैं फिर से सूर्य देव अपने ताप से हिम को जल बना कर, प्राणियों के लिए, निरंतर जल आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं | जल से ही जीवन संभव है हम सभी जानते हैं लेकिन देवों के बिना दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक इतने जल की आपूर्ति नही करा सकता| इसलिए ईश्वर के साथ साथ देव भी पूजनीय हैं|श्रीमद् भगवद्
गीता में अनेक श्लोकों द्वारा ईश्वर ने स्वयं और देवों में भेद बतलाए हैं| पुष्टिकरण के लिए कुछ श्लोक उदाहरण स्वरूप यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ|
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌ ॥
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ॥
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌ ॥
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्‌ ॥
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌ ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥
मैं मीडियाकर्मियों से इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि थोड़ा स्वाध्याय करके तथ्यों की तह तक जाने का प्रयास किया कीजिए| अपना माल बेचने की होड़ में यूँ ही न किसी बात को विवाद का मुद्दा बनाया कीजिए|
धन्यवाद |
[आलेख व प्रस्तुति: भगवान दास मेहंदीरत्ता गुड़गाँव]



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