मेरा देश मेरी बात !

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फिर बहेगा लहु इक बार, फिर महाभारत होने को है!

Posted On: 14 Feb, 2016 में

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मस्लाहत अज़ीम होते हैं सियासत के कदम
तू न समझेगा सियासत, तू अभी इंसान है
कल नुमाइश में मिला था चीथड़े पहने हुए
मैने पूछा नाम तो, बोला हिन्दुस्तान है
(कवि दुष्यंत कुमार)
आज देश में परम नैराश्य की स्थिति है| जिस तरह से कांग्रेस व कौम्युनिस्ट जैसी देश की नामी गिरामी राजनीतिक पार्टियाँ भारत के एक सम्मानित शिक्षण संस्थान, JNU में देश द्रोहियों के बचाव में ढाल बन कर खड़ी हो गई हैं, बहुत ही शर्मनाक व निराशाजनक बात है| हो सकता है सत्ता के लोलुप राजनितिज्ञो की रणनीति रही हो कि देश द्रोह की आग को सुलगाय रख कर ही सत्तासुख आसानी से भोगा जा सकता है| परंतु देश बिना सत्ता कहाँ ? ताज़ा परिदृश्य देख कर तो यकीन हो चला है कि देश के न केवल धार्मिक स्थल बल्कि शिक्षा के मंदिर आज, सियासी पार्टियों की पौध-शालाएँ बन कर रह गई हैं| कैसी विडंबना है कि देश द्रोह जैसी गतिविधियाँ जिन संस्थाओं में खुले आम चल रही हों, जहाँ से अपनी ही माँ अर्थात मातृभूमि के टुकड़े करने की आवाज़ें उठ रही हों, जहाँ पर देश के गद्दारों को शहीद बता कर उनके सम्मान में कशीदे पढ़े जा रहे हों, जहाँ पर देश को बेचने की बोली लगाई जा रही हो, वहाँ पर पुलिस, प्रशासन अथवा सरकार के प्रवेश पर न केवल अंगुली उठाई जाए बल्कि इसे अराजकता बताया जाए ! इन संस्थानों की स्वायतता देश की अखंडता और प्रभुसत्ता से श्रेष्ठ क्यों कर?
अपेक्षा की जा रही है कि विश्विद्यालय प्रशासन ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने में सक्षम होता है और वही अपराधियों पर कार्यवाही कर सकता था| जानकर अनजान बनने की कोशिश की जा रही है| इसका जीवंत उदाहरण हम हैदराबाद कांड में देख चुके हैं| विश्वविद्यालय के उपकुलपति को तो इतना भी अधिकार नहीं कि किसी छात्र को अवांछनीय गतिविधियों में लिप्त पाए तो उसे कुछ दिन के लिए संस्थान से निलंबित कर सके| आज पाँचवीं कक्षा के छात्र का अपने किसी सहपाठी पर परकार अथवा पेन जैसे धारदार पिंड से वार करने पर भी मुर्गा बनने जैसी सज़ा देने का अधिकार नहीं है किसी अध्यापक को, युवा,उपर से राजनितिज्ञो का श्रेय प्राप्त छात्रों के विरुद्द कोई कार्यवाही कर पाना सोच से भी परे है| अंदर के लोगों से पूछ कर तो देखें ज़रा, क्या उन्हें पहले से नहीं मालूम कि संस्थान के भीतर क्या क्या चल रहा है? जिन अध्यापकों व अधिकारियों की डोर नेताओं के हाथ में हों वे अधिकारी आख़िरकार हैं तो इंसान ही, किस के बूते की बात है जो उन विद्यार्थियों से दुश्मनी मोल ले जिनका मकसद किसी तरह की शिक्षा ग्रहण करना नहीं बल्कि राजनीतिक अशांति फैलाना है और फिर शक्तिशाली राजनीतिक दल जिनके पीछे खड़े हों | उन विद्यार्थियों को बखूबी मालूम है कि इस देश में सत्ता के पद सर्वोच्च पद हैं और उन्हें पाने के लिए शिक्षा की नहीं नामी अपराधी होने की आवश्यकता है| वे ये भी जानते हैं कि जो समझ बूझ रखते हैं उनमेँसे अधिकांश तो वोट डालने को घरों से निकलते ही नहीं और अनपढ़ और ना समझ वोटरों के लिए उनके पास साम, दाम, दंड जैसे अनेकों हथकंडे हैं|
प्रश्न ये उठता है कि यदि राजनीतिक पार्टियों द्वारा देश की युवा शक्ति की कच्ची मिट्टी और गर्म खून का प्रयोग अपने अपने सिपहसालार तौयार् करने में किया जा रहा है तो पाकिस्तान पर आतंकवादी उद्योगशाला होने का इल्ज़ाम क्यों ? हम क्या उनसे कम हैं ? हम भी तो वही कर रहे हैं| हमने भी शिक्षण संस्थानों में धार्मिक उन्माद फैलाने वाले कारखाने नहीं लगा रखे क्या ?
धुआँ उठा है मतलब आग ज़ोरों से सुलग रही है| इस आग पर काबू पा लेना शिक्षण संस्थानों के अधिकारियों के बस की बात अब नहीं रही| वे तो जैसे तैसे अपनी खाल बचाए होंगे, उनके लिए तो इतना ही बहुत है| होना तो ये चाहिए कि बिना किसी पूर्वाग्रह के सभी छात्रों के कमरों की गहन तलाशी ली जानी चाहिए और कोई भी छात्र संघ हो उस के पदाधिकारियों की गतिविधियों पर सरकार गुप्त रूप से नज़र रखे |कांग्रेस और कौम्युनिस्ट पार्टियाँ जिस तरह से प्रथम दृष्टि में आपराधिक गतिविधियों में लिप्त छात्रों के बचाव में उठ खड़ी हुई हैं उससे तो लगता है कि उन्हें और भी संगीन खुलासे होने का भय सताने लगा है| वरना प्राथमिक तौर पर मुखर रूप से देश द्रोही गतिविधियों में सक्रिय नज़र आने वाले शक्स को अगर पुलिस पूछताछ के लिए हिरासत में लेती है तो क्या वह उसे फाँसी पर चढ़ा सकती है? अपराध अगर सिद्द न होंगे तो क्या कोई सज़ा दी जा सकती है? फिर इतना बवाल क्यों? ठीक है आपका बंदा था तो पहले उसे समझा कर रखना था न, कि देश द्रोहियों से दूरी बना कर रखना| इस सारी लड़ाई में भारतीय जनता पार्टी के साथ भी ABVP जैसे छात्र संघ को जोड़ा जा रहा है| इसलिए भारतीय जनता पार्टी भी स्वयं को पाक साफ न समझे| आज नही तो कल वे भी अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए अवश्य ही ऐसे छात्रसंघों का इस्तेमाल करती रही होगी|
राहुल गाँधी जी बोले कि हिटलर स्वयं को देश भक्त कहता था| समझ रहे हैं उनका इशारा, “प्रधानमंत्री मोदी जी की तुलना हिटलर जैसे तानाशाह से की जा रही है और ये भी कि भारतीय जनता पार्टी अपने आप को सच्चा देश भक्त साबित करने की कोशिश कर रही है|”तो क्या उनको देश भक्त होने के खिताब दिए जाएँ जो मातृभूमि के टुकड़े करने की बात कर रहे हैं या उनको सच्चा देश भक्त मान लिया जाए जो लोग देश के नंबरी दुश्मन के जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं? या केवल उन्हीं नेताओं को देश भक्त मान लिया जाए जो उन देश द्रोही ताकतों के पोषक होने का सरेआम सबूत दे रहे हैं?
माननीय अरविंद केजरीवाल जी, बस क्या? केवल एक ही साल की सत्ता का भोग इस हद तक हावी हो गया है आप पर कि आपको शिक्षा के मंदिर में तपस्वी के भेष में राजद्रोही, अहंकारी, कपटी लोग नज़र नहीं आए? या आप भी केवल भारतीय जनता पार्टी की छवि बिगाड़ने की ग़र्ज़ से देश की अपदस्थ राजनीतिक पार्टियों की भीड़ में शामिल हो गये हैं| कीचड़ में घुसे बगैर कीचड़ को साफ करने का कोई विकल्प है क्या आपके पास? नहीं है, तो सरकार की कार्यवाही पर बव्वाल क्यों? विध्वंसकारी चाल है ये आपकी, अत्यंत विध्वंसकारी |
उधर करण ज़ोहर चाहते हैं अभिव्यक्ति के नाम पर किसी की आस्था का मज़ाक उड़ाने की स्वतंत्रता दे दी जाए पर आस्था रखने वाले विरोध भी न करें | अभिव्यक्ति के नाम पर पाश्चात्य देशों की ही तरह भारतीय सिनेमा में भी नगन्ता परोसने की छूट दे दी जाए| उनके लिए फिल्म पर सैकड़ों करोड़ का ग्राफ और ऊँचा और ऊँचा करने की होड़ लगी है देश या देश की सांस्कृतिक विरासत जाए भाड़ में| इधर राजनीतिक दल फिल्म जगत से भी दो कदम आगे हैं| पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाना, अपने तिरंगे का अपमान व दुश्मन के झंडे का सम्मान, देश के टुकड़े करने की वकालत, अभिव्यक्ति है| उनके लिए ये सब मनोरंजन के विषय हैं, सरकार व प्रशासन इसमें बाधा न बने तो ही अच्छा है|बने, तो ये उनके मौलिक अधिकारों पर आघात होगा|

अजब विषम परिस्थितियाँ पैदा हो गई हैं| कहने को यहाँ प्रजातंत्र है मगर सत्ता सुख भोगते भोगते जिन्हें अर्ध शतक से भी अधिक समय हो गया है वे लोग देश की सत्ता को अपना अधिकार मान बैठे हैं और सत्ता अपनाने का कोई भी हथकंडा छोड़ना नहीं चाहते| जानते हुए कि ऐसी मानसिकता न केवल देश के लिए बल्कि स्वयं उनके लिए भी घातक है| भय तो इस बात का है कि देश इस समय खूनी संघर्ष की ओर बढ़ रहा है| राजसुख भोगने के लालची नेता अपने क्रियाकलापों से देश वासियों में इतनी ख़ाइयाँ पैदा कर देंगे कि देश में गृह युद्द की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी| आग लगाने वाले अपने अपने सुरक्षित ठिकानों में छिप जाएँगे| मूर्ख बनी जनता आपस में कट मर जाएगी| शायद यही है प्रकृति का नियम भी, यही है अर्थशास्त्री माल्थस की थ्योरी कि जब जनसंख्या ज़रूरत से अधिक बढ़ जाएगी तो प्रकृति और मानव में संतुलन स्थापित करने के लिए प्रकृति कोई न कोई खेल रचाएगी | मानवता को समाप्त करने के अनेकों प्रयास किए जा रहे हैं| विभिन्न प्रकार के अस्त्र शस्त्र एकत्र किए जा रहे हैं? क्या प्रकृति किसी खूनी खेल की ओर बढ़ रही है?
उग्रवाद अथवा अतिवाद जैसा हथियार अपना कर कब किसी का भला हुआ है? पाकिस्तान यदि अपनी लगाई आग में खुद झुलस रहा है तो हम किन राहों पर चल रहे हैं| आतंकवाद के दोष व दंश को राहुल गाँधी से ज़्यादा कौन समझेगा? उन्होने तो दादी और पिता, घर ही के दो, दो सदस्यों पर आतंकवाद का आघात सहा है|
धीरे धीरे देश दो ध्रुवों में बँटता जा रहा है| इस ध्रुवीकरण का परिणाम कहीं खूनी टकराव न हो|क्योंकि इस बार सियासत में ”
कौरव ही कौरव हैं सारे, दूजा कोई और नहीं है,
आज के इस महान भारत में पांडवों का ठौर नही है
संसद में बिसात बिछी है……………………………..
तुम्हें ईश्वर की सौगंध है ऐ देश के नेताओ, भुला दो इकबार अपने अपने स्वार्थ को अपने देश की ख़ातिर, मिलकर दबा दो विनाश की इस पौध को यहीं के यहीं| वरना मैं तो देख ही रहा हूँ कि :
उँचे उठे हैं धुँए के गुब्बार
आग के बादल छाने को हैं|
फिर बहेगा लहु इकबार,
फिर महाभारत होने को है|
इसी सन्दर्भ में कृपया मेरी इस कविता को भी पढ़ने का समय निकालें
http://bhagwandassmendiratta.jagranjunction.com/2014/08/22/संसद-में-बिसात-बिछी-है-4/
भगवान दास मेहंदी रत्ता गुड़गाँव



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